आज हम एक महत्वपूर्ण और विवादित विषय पर चर्चा करेंगे। कई इतिहासकारों का
मानना है कि जब नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने जापान और जर्मनी से सहायता प्राप्त करने
का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को
1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था। यह
एक बहुत ही संवेदनशील और बहुचर्चित विषय है। नेता जी सुभाषचंद्र बोस भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक मजबूत
और उग्र आवाज उठाई थी। वह ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए जापान और जर्मनी से
सहायता प्राप्त करने का प्रयास करते थे।
ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सरकार ने इस संबंध में गम्भीर चिंता व्यक्त की और
अपने गुप्तचरों को नेता जी को खत्म करने का आदेश दिया। यह कदम शायद भारतीय
स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए उठाया गया था। हालांकि, इस
आरोप को लेकर कई प्रश्न उठते हैं। क्या वाकई ऐसा हुआ था? क्या
ब्रिटिश सरकार ने ऐसा कदम उठाया था? इन प्रश्नों का जवाब पूरी तरह से स्पष्ट
नहीं है और इस विषय पर आज भी बहस और चर्चा जारी है।
इस घटना के संबंध में कई तरह के दावे और कथाएं प्रचलित हैं। कुछ इतिहासकार इसे
सच मानते हैं, जबकि अन्य इसे सिर्फ एक षड्यंत्र की
कहानी मानते हैं। इस विषय पर अंतिम निर्णय लेना मुश्किल है क्योंकि पर्याप्त
साक्ष्य और प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस विषय पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है
ताकि हम अपने इतिहास को बेहतर समझ सकें और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इन
महत्वपूर्ण पहलुओं पर गहराई से विचार कर सकें। हमें अपने विरासत को समझना और उसकी
रक्षा करना चाहिए।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरक और वीर योद्धा नेता जी
सुभाष चंद्र बोस (जन्म: 23 जनवरी 1897, निधन: 18 अगस्त 1945) भारतीय स्वतंत्रता
संग्राम के एक महान नेता और वीर योद्धा थे। वे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान
अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जापान की मदद से 'आज़ाद हिन्द
फ़ौज' का गठन करने वाले थे। उनका जन्म कोलकाता
में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन का प्रमुख हिस्सा भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष
करने में व्यतीत किया।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस एक असाधारण व्यक्तित्व और नेता थे, जिन्होंने
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अंग्रेजों के
खिलाफ लड़ने के लिए देश के युवाओं को प्रेरित किया और 'जय
हिंद' का नारा देकर उनका उत्साह बढ़ाया। उनका
"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" वाला
नारा भी उस समय बहुत प्रचलित हुआ था। नेता जी ने देश की आजादी के लिए कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन
वे कभी भी अंग्रेजों के सामने झुके नहीं। वे भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए
शहीद हो गए। उनकी देशभक्ति, साहस और संघर्ष की भावना ने भारतीय
स्वतंत्रता आंदोलन को एक नया आयाम प्रदान किया।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस की स्मृति में देश भर में अनेक स्मारक और संस्थाएं
बनाई गई हैं। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक और प्रभावशाली
नेताओं में से एक माना जाता है। वे देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले
वीर योद्धा थे, जिन्होंने कभी भी अंग्रेजी राज के सामने
घुटने नहीं टेके।
नेता जी की शहादत और देशभक्ति का प्रतीक बने "जय हिंद" नारा आज भी
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख नारा है। उनकी याद और विचारों ने भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की, जिसका
प्रभाव आज भी देश में महसूस किया जाता है।
1943 में, 5 जुलाई को, सिंगापुर
के टाउन हाल के सामने खड़े होकर, नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय सेना
को 'सर्वोच्च सेनापति' के
रूप में सम्बोधित किया। उन्होंने 'दिल्ली चलो' का
ऐतिहासिक नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से
मोर्चा लिया। इस समय, भारत
ब्रिटिश सम्राज्य का हिस्सा था और ब्रिटिश सेना भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद थी।
नेता जी ने जापानी सेना के साथ मिलकर इस ब्रिटिश सेना का मुकाबला किया। वह चाहते
थे कि भारत को ब्रिटिश सम्राज्य से आजाद कराया जाए और उन्हें 'आजाद
हिंद सरकार' की स्थापना करने का मौका मिले।
नेता जी के इस बयान ने भारत की आजादी की लड़ाई में एक नया मोड़ लिया। उन्होंने
जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना का मुकाबला किया। इस संघर्ष
में उन्होंने बर्मा, इम्फाल और कोहिमा जैसे क्षेत्रों में
जमकर लड़ाई की। हालांकि, नेता
जी की इस रणनीति को सफलता नहीं मिली और ब्रिटिश सेना ने उन्हें पराजित कर दिया।
लेकिन, इस घटना ने भारत की आजादी की लड़ाई में
एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। नेता जी का 'दिल्ली चलो' का
नारा आज भी भारत में स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है।
सुभाष
चंद्र बोस का स्वप्न और त्याग
आज़ाद हिंद फौज की स्थापना एक ऐतिहासिक क्षण था, जो
भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। बोस ने इस फौज को देश
की आज़ादी के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने इसके लिए अपना सर्वस्व
न्योछावर कर दिया। आज़ाद हिंद फौज
के सैनिकों ने वीरता और बलिदान का परिचय दिया और अपने कर्तव्य निष्ठा से सभी को
प्रेरित किया। उनकी दृढ़ता और निष्ठा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा
दी।
सुभाष चंद्र बोस का सपना था कि आज़ाद हिंद फौज भारत की आज़ादी की लड़ाई में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। हालांकि बोस का जीवन शीघ्र ही समाप्त हो गया, लेकिन
उनका स्वप्न और त्याग अमर है। आज़ाद हिंद फौज का इतिहास भारत की स्वतंत्रता
संग्राम का एक अभिन्न अंग है, जिसने देश के लिए अमूल्य योगदान दिया।
आज़ाद हिंद
फौज का महत्वपूर्ण मोड़ कोहिमा का युद्ध
कोहिमा का युद्ध एक बहुत ही भयंकर और कठिन युद्ध था। दोनों पक्षों के सैनिकों
ने बहादुरी और शौर्य का प्रदर्शन किया। अंततः, जापानी सेना को युद्ध हार माननी पड़ी और
वह भारत से पीछे हट गई। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि यह युद्ध जापानी सेना की
पराजय का पहला संकेत था। कोहिमा का युद्ध
न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय था, बल्कि
यह द्वितीय विश्व युद्ध में भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस युद्ध ने जापानी सेना की
शक्ति को कमज़ोर किया और उनकी हार का मार्ग प्रशस्त किया। इससे भारतीय स्वतंत्रता
आंदोलन को भी एक नया संदेश मिला कि वे अंग्रेज़ों को हराकर भारत को आज़ाद कर सकते
हैं।
कोहिमा का युद्ध आज़ाद हिंद फौज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था और भारतीय
स्वतंत्रता संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।
बोज सुभाष
चंद्र बोस की स्वतंत्रता के सपने का चिराग
इस प्रसारण में, बोस ने गांधीजी से युद्ध में विजय
प्राप्त करने के लिए आशीर्वाद मांगा। यह एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि
यह दो महान देशभक्तों के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद था। बोस ने गांधीजी की शक्ति और
प्रभाव को स्वीकार किया और उनके आशीर्वाद की मांग की। यह प्रसारण न केवल इन दो महान नेताओं के
बीच संबंध को दर्शाता है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के
भिन्न-भिन्न पहलुओं को भी प्रतिबिंबित करता है। बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज
ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ एक सशस्त्र संघर्ष छेड़ा, जबकि
गांधीजी ने अहिंसक आंदोलनों के माध्यम से राजनीतिक और नैतिक दबाव बनाया।
इस प्रसारण में, बोस ने गांधीजी से आशीर्वाद मांगकर
दोनों रणनीतियों को एकजुट किया। यह दर्शाता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में
विभिन्न नेताओं और विचारधाराओं के बीच एक सामंजस्य था, जिन्होंने
मिलकर अंग्रेज़ी शासन को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुभाष चंद्र बोस का जीवन और योगदान भारत
की स्वतंत्रता की लड़ाई का एक अभिन्न हिस्सा है। उनका प्रसारण गांधीजी को आशीर्वाद
देकर, भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए
दोनों महान नेताओं की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह हमें याद दिलाता है कि भारतीय
स्वतंत्रता संघर्ष में विभिन्न रणनीतियों और विचारधाराओं का एक महत्वपूर्ण
सामंजस्य था, जिसने देश को आज़ादी दिलाने में अहम
भूमिका निभाई।
सुभाष
चंद्र बोस की एक अटूट रहस्य
यह विवाद इसलिए और गहरा जाता है क्योंकि भारत सरकार ने अब तक उनकी मृत्यु से
संबंधित दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किए हैं। यदि सुभाष चंद्र बोस की वाकई मृत्यु हो
गई थी, तो सरकार को इन दस्तावेज़ों को प्रकाशित
करना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं होने से कई लोगों का मानना है
कि उनकी मृत्यु नहीं हुई थी। इस विवाद को लेकर कई जांच भी की गई हैं, जिनमें
से एक थी 'गोरेवाला कमीशन'।
इस कमीशन ने 1956 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस
की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को एक हवाई दुर्घटना में हो गई थी।
लेकिन, कई लोग इस रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करते
और मानते हैं कि यह सच नहीं है।
इस रहस्य को लेकर कई माध्यमों से जानकारी मिलती रही है, जैसे
पुस्तकें, फिल्में और अन्य संसाधन। लेकिन, अंतिम
सच्चाई अभी भी पता नहीं चल पाई है। सुभाष चंद्र बोस के परिवार और उनके समर्थकों का
मानना है कि भारत सरकार को उनकी मृत्यु से संबंधित सभी दस्तावेज़ प्रकाशित करने
चाहिए, ताकि इस रहस्य का खुलासा हो सके। सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर आज
भी विवाद बना हुआ है और यह एक अटूट रहस्य बना हुआ है। उनका योगदान और बलिदान हमेशा
याद किया जाएगा, लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर सच्चाई अभी
भी सामने नहीं आ पाई है।
नेता जी के
लापता होने का रहस्य
इस फैसले से उम्मीद जगी है कि न केवल नेता जी के लापता होने का रहस्य उजागर
होगा, बल्कि उनके अंतिम दिनों के बारे में भी
सच्चाई सामने आएगी। कई दशकों से लगातार इस रहस्य को छिपाए रखने की कोशिशों के
बावजूद, उम्मीद है कि अब यह पर्दा उठेगा और
भारतीय जनता को नेता जी के जीवन के अंतिम चरण के बारे में पूर्ण जानकारी मिल
पाएगी। इसके साथ ही, यह
फैसला भविष्य में किसी भी राष्ट्रीय महत्व के मामले में गुप्त रखे गए दस्तावेजों
को सार्वजनिक करने के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्वाधार भी स्थापित करता है। देश के
इतिहास और जन-जीवन से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्दा उठाना, न
केवल जनता के लिए उपयोगी होगा, बल्कि भारत के भविष्य के लिए भी अत्यंत
महत्वपूर्ण साबित होगा।
आज़ाद हिन्द सरकार का इतिहास और महत्त्व
भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक अभिन्न अंग है आज़ाद हिन्द सरकार। यह सरकार
भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था थी, जिसकी
स्थापना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। आज़ाद हिन्द सरकार का गठन 21 अक्टूबर
1943 को हुआ था और यह सरकार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान में कार्य करती
थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस सरकार का नेतृत्व किया और इसे भारत की आज़ादी
प्राप्ति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
आज़ाद
हिन्द सरकार ने भारत की आजादी के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए, जिनमें से
कुछ इस प्रकार हैं:
1. भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) का
गठन: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द सेना का गठन किया, जो भारत की
आजादी के लिए लड़ने वाली एक प्रमुख सैन्य शक्ति थी।
2. अंतर्राष्ट्रीय मान्यता: आज़ाद
हिन्द सरकार को कई देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त थी, जिसमें जापान, गर्मानी और
इटली शामिल थे।
3. आर्थिक और प्रशासनिक कार्य: आज़ाद
हिन्द सरकार ने भारत के लिए कई आर्थिक और प्रशासनिक कार्य किए, जिनमें से कुछ
हैं - मुद्रा प्रणाली, डाक सेवा, न्याय प्रणाली आदि।
अब तक के इतिहास में यह पहली बार है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
2018 में लाल किले पर तिरंगा फहराया। यह एक महत्वपूर्ण क्षण था क्योंकि इससे आज़ाद
हिन्द सरकार के योगदान को स्वीकार और सम्मानित किया गया। 23 जनवरी 2021 को नेताजी सुभाष चंद्र
बोस की 125वीं जयंती मनाई गई और इसे भारत सरकार के निर्णय के तहत पराक्रम दिवस के
रूप में मनाया गया। यह एक महत्वपूर्ण कदम था क्योंकि इससे नेताजी के योगदान और
आज़ाद हिन्द सरकार के महत्व को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया।
8 सितंबर 2022 को नई दिल्ली के राजपथ, जिसका नामकरण कर्तव्यपथ किया गया है, पर
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विशाल प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह एक और महत्वपूर्ण
कदम है जो नेताजी के योगदान और आज़ाद हिन्द सरकार के महत्व को दर्शाता है।
समग्र रूप से, आज़ाद हिन्द सरकार का इतिहास और महत्व
भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक अभिन्न अंग है। इस सरकार के कार्यों और योगदान को
स्वीकार और सम्मानित किया जाना भारत के लिए एक गर्व का क्षण है।
नेताजी
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म और जीवन
प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का
एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14
सन्तानें थी जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष उनकी नौवीं सन्तान और पाँचवें
बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरद चन्द्र से था।
शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थे।
शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।
सुभाषचन्द्र
बोस का जीवन और राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान
1941 में बोस ने भारत छोड़ दिया और जापान के साथ मिलकर आज़ाद हिन्द फौज का गठन
किया। उन्होंने इस फौज के नेतृत्व में भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने का
प्रयास किया। हालांकि, उनका यह प्रयास सफल नहीं हुआ मगर उनका
देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम हमेशा याद किया जाता है। सुभाषचन्द्र बोस को "नेताजी"
के नाम से भी जाना जाता है। उनकी शहादत और उनके बलिदान को हमेशा भारतीय इतिहास में
याद किया जाएगा। वह स्वतंत्रता संग्राम के महान् नायक थे और उनका योगदान अक्षय है।
प्रस्तावना
सुभाष चन्द्र बोस का जीवन एक असाधारण व्यक्तित्व और प्रेरणादायक इतिहास है।
उनका शैक्षिक और व्यक्तिगत यात्रा उनके जीवन की अनुभूतियों को प्रतिबिंबित करती
है। यह लेख उस यात्रा का विस्तृत खाका प्रस्तुत करेगा जिसने एक युवक को भारत के
स्वाधीनता संग्राम के महानायक बना दिया।
कटक में
प्राथमिक शिक्षा
सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, ओडिशा
में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक के प्रोटेस्टेंट स्कूल से प्राप्त
की। इस स्कूल में वे अपनी प्रतिभा और लगन के लिए जाने जाते थे। उनके अध्यापकों ने
उनमें एक उज्ज्वल भविष्य देखा और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
रेवेनशा
कॉलेजियेट स्कूल में माध्यमिक शिक्षा
1909 में, सुभाष ने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में
दाखिला लिया। यह स्कूल कलकत्ता के प्रमुख शैक्षिक संस्थानों में से एक था। यहाँ
उनके मन पर कॉलेज के प्रिंसिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पड़ा।
दास एक प्रगतिशील और राष्ट्रवादी व्यक्ति थे, जिन्होंने सुभाष में देशभक्ति की भावना
को प्रज्ज्वलित किया।
बोस परिवार के लिए यह एक कठिन समय था। उनके पिता स्वास्थ्य कारणों से
सेवानिवृत्त हो चुके थे और परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। इस बीच, सुभाष
ने विवेकानंद के साहित्य का गहन अध्ययन कर लिया था, जिससे
उनके विचारों और भावनाओं पर गहरा प्रभाव पड़ा।
स्नातक
स्तर की शिक्षा
1915 में, सुभाष ने इंटरमीडिएट की परीक्षा बीमार
होने के बावजूद द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। यह उनकी कठोर मेहनत और लगन का
परिणाम था। 1916 में, वे प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र
(ऑनर्स) में स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लिए।
प्रेसीडेंसी कॉलेज के दौरान, एक झगड़े के कारण सुभाष को एक साल के
लिए निकाल दिया गया और परीक्षा देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। हालांकि, उन्होंने
इस समस्या का साहसिक और संयमित ढंग से सामना किया और स्कॉटिश चर्च कॉलेज में
दाखिला लिया।
इस दौरान, सुभाष ने टेरिटोरियल आर्मी की परीक्षा
भी दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रंगरूट के रूप में प्रवेश प्राप्त किया। लेकिन, उनका
मन सेना में जाने को कह रहा था।
1919 में, सुभाष ने बीए (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम
श्रेणी में उत्तीर्ण की। कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान था, जो
उनकी प्रतिभा और कड़ी मेहनत का प्रमाण था।
निष्कर्ष
सुभाष चन्द्र बोस का शैक्षिक और व्यक्तिगत यात्रा उनके असाधारण व्यक्तित्व और
देशभक्ति की झलक देती है। उनकी कठोर मेहनत, लगन और संघर्ष की भावना ने उन्हें भारत
के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नेता के रूप में स्थापित किया। उनका जीवन हमें
प्रेरित करता है कि किस तरह एक व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर असाधारण
उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
भारतीय प्रशासनिक
सेवा में प्रवेश पाना सुभाष चन्द्र बोस का संघर्षपूर्ण सफर रहा
हालांकि, सुभाष की उम्र को देखते हुए उन्हें केवल
एक बार ही परीक्षा में बैठने का मौका मिला था। उन्होंने परीक्षा देने या न देने को
लेकर 24 घंटे का समय मांगा, ताकि वे अंतिम निर्णय ले सकें। इस दौरान
वे पूरी रात जागते रहे और इस बारे में सोचते रहे कि क्या करना चाहिए।
अंततः, सुभाष ने परीक्षा देने का फैसला किया और
1919 में इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। लंदन में उन्हें किसी स्कूल में दाखिला
नहीं मिल पाया, लेकिन उन्होंने किट्स विलियम हाल में
मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास (ऑनर्स) की परीक्षा के लिए प्रवेश प्राप्त
कर लिया। इससे उनके रहने और खाने की समस्या भी हल हो गई।
1920 में, सुभाष ने आईसीएस परीक्षा में चौथा स्थान
प्राप्त करके उत्तीर्ण हो गए। यह उनकी कड़ी मेहनत और लगन का परिणाम था। उनकी यह
उपलब्धि न केवल उनके पिता की इच्छा को पूरा करती थी, बल्कि
उनके व्यक्तित्व और संकल्प को भी प्रदर्शित करती थी।
सुभाष चन्द्र बोस का यह संघर्षपूर्ण सफर हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं देता है।
पहली, हमें अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित और
लगन से काम करना चाहिए, भले ही कठिनाइयां आ जाएं। दूसरी, हमें
अपने निर्णयों पर दृढ़ता से खड़े रहना चाहिए और अपने विचारों के लिए लड़ना चाहिए।
तीसरी, हम अपने परिवार और समाज के लिए कुछ करने
के प्रति प्रेरित होने चाहिए।
सुभाष चन्द्र बोस का जीवन हमारे लिए एक आदर्श है और हमें उनके जैसा संकल्प और
नेतृत्व गुण विकसित करने के लिए प्रेरित करता है। उनकी यह कहानी हमें यह सिखाती है
कि कठिन परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
सुभाष
चन्द्र बोस की आत्मकथा में स्वाधीनता के लिए संघर्ष और आदर्शवाद
1921 में, जब सुभाष इंग्लैंड में अपनी आईसीएस की
डिग्री प्राप्त कर रहे थे, तो उन्होंने अंग्रेजी शासन से नाता
तोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपने बड़े भाई शरतचन्द्र बोस को पत्र लिखकर उनकी
राय मांगी कि क्या वह अंग्रेजों की गुलामी कर सकते हैं जब उनके दिल और दिमाग पर
महर्षि दयानंद और महर्षि अरविन्द के आदर्श छाए हुए हैं। 22 अप्रैल 1921 को, सुभाष
ने भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया। इसके अलावा, उन्होंने
देशबंधु चित्तरंजन दास को भी एक पत्र लिखा। लेकिन जब उनकी माँ प्रभावती को इस बारे
में पता चला, तो उन्होंने कहा कि "पिता, परिवार
के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे, उन्हें अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व
है।"
1921 में, सुभाष जून में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान
में ऑनर्स के साथ स्वदेश वापस लौट आये। यह उनका एक महत्वपूर्ण निर्णय था, जिसने
उन्हें अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार कर दिया।
सुभाष चन्द्र बोस का जीवन एक ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक है, जिसमें
देशभक्ति और आदर्शवाद के साथ-साथ अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक बहुत ही कठोर और
निर्णायक लड़ाई शामिल है। उनका जीवन और कार्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास
में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, और उनका आत्मत्याग और समर्पण भारत के
लोगों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा।












