कश्मीर जम्मू-कश्मीर का उत्तरी
भौगोलिक क्षेत्र है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जटिल इतिहास के
लिए विश्व में प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र 1846 में पहले एंग्लो-सिख युद्ध में
सिख की हार के बाद ब्रिटिश से खरीदा गया था, और जम्मू के राजा गुलाब सिंह
इसके नए शासक बने। उनके वंशजों का शासन ब्रिटिश क्राउन की सर्वोपरि (अधिराजस्व) के
तहत हुआ, जो 1947 में भारत
के विभाजन तक चला।
भारत के विभाजन के बाद, कश्मीर एक विवादित क्षेत्र बन गया, जिसे अब तीन देशों द्वारा प्रशासित किया जाता है: भारत, पाकिस्तान और चीन। इस क्षेत्र पर हुए युद्धों और संघर्षों ने इसे विश्व स्तर पर एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। कश्मीर का नाम और व्युत्पत्ति महर्षि कश्यप से जुड़ी है, जिन्होंने यहां सप्तर्षियों का आश्रम स्थापित किया था। यह एक मुस्लिम-बहुल क्षेत्र है, जहां हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और सिख धर्मों का प्रभाव रहा है। यह क्षेत्र अपनी विविधता, सांस्कृतिक धरोहर और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है।
कश्मीर की भौगोलिक स्थिति ने इसे
एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान बना दिया है। इसकी पर्वतीय सीमाएं और कश्मीर घाटी में
स्थित होने के कारण, यह क्षेत्र भारत, पाकिस्तान
और चीन के बीच एक विवादित क्षेत्र बना रहा है। इस क्षेत्र पर हुए युद्धों और
संघर्षों ने इसे विश्व स्तर पर एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। कश्मीर की
सुंदरता और उसका विविध सांस्कृतिक परिदृश्य इसे पर्यटन के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण
बनाते हैं। यहां के झीलों, घाटियों, बर्फीले पर्वत, बागान और
उद्यान अनेकों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इसके साथ ही, यहां के
लोक-संस्कृति,
कला, संगीत और
भाषा भी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
कश्मीर के विवादास्पद राजनीतिक
स्थिति के बावजूद, यह क्षेत्र अपनी अद्वितीय सुंदरता और
सांस्कृतिक विविधता के कारण विश्व में प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र न केवल भारत, पाकिस्तान
और चीन के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक महत्वपूर्ण भूमि है, जिसका
संरक्षण और संवर्धन किया जाना चाहिए।
गहरी छाया
में खो गया कश्मीर एक भूमि की उत्पत्ति और अस्मिता का अन्वेषण
कश्मीर की भूमि और इसके लोगों का
इतिहास उतना ही गहरा और रहस्यमय है, जितना कि इसके प्राकृतिक
सौंदर्य। निलामाता पुराण में कश्मीर की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, जो
भू-वैज्ञानिकों द्वारा पूर्णतः पुष्टि किया गया है। यह दर्शाता है कि कश्मीर का
नाम कितना परिशुद्धि की प्रक्रिया से लिया गया था - 'का' का अर्थ है
"पानी" और 'शमीर' का अर्थ है "शुष्क
करना"। इसलिए, कश्मीर "पानी से निकलने वाला देश"
के लिए खड़ा है।
कश्मीर इतिहास में कई नामों से
जाना जाता है। कश्मीरियों ने इसे 'काशीर' कहा, जो कश्मीर
से ध्वन्यात्मक रूप से प्राप्त हुआ है। प्राचीन यूनानी इतिहासकारों ने इसे 'कश्पापा-पुरका' कहा, जो 'कस्पेरियोस' (बायज़ांटियम
के एपड स्टेफेनस) और 'कस्तुतिरोस' (हेरोडोटस)
से संबंधित है। कश्मीर को टॉलेमी के 'कस्पीरीया' देश के रूप
में भी जाना जाता है। कश्मीर की उत्पत्ति और नामकरण के इन रहस्यमय पहलुओं के अलावा, यह क्षेत्र
अपने प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। यह हिमालय
के दिल में स्थित है, जहां ऊंची पहाड़ियां, झीलें, नदियां और
सुंदर वनस्पति मिलती हैं। लंबे समय से, यह शांति, आध्यात्मिकता
और कला का केंद्र रहा है।
हालाँकि, कश्मीर की
गहरी और संपन्न इतिहास को अक्सर ऐतिहासिक संघर्षों और राजनीतिक गतिरोधों में धंसा
दिखाई देता है। यह क्षेत्र भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच एक भू-राजनीतिक
गुलदस्ता बन गया है, जिसमें हिंसा, बेरोजगारी और विस्थापन के
साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है।
कश्मीर का
इतिहास
मार्तण्ड मंदिर (सूरज मंदिर)
बुर्ज़होम पुरातात्विक स्थल
(श्रीनगर के उत्तरपश्चिम में 16 किलोमीटर (9.9 मील) स्थित) में पुरातात्विक
उत्खनन[6] ने 3,000 ईसा पूर्व और 1,000 ईसा पूर्व के बीच सांस्कृतिक महत्त्व के
चार चरणों का खुलासा किया है। अवधि I और II नवपाषाण
युग का प्रतिनिधित्व करते हैं; अवधि ईएलआई
मेगालिथिक युग (बड़े पैमाने पर पत्थर के मेन्शर और पहिया लाल मिट्टी के बर्तनों
में बदल गया);
और अवधि
प्रारंभिक ऐतिहासिक अवधि (उत्तर-महापाषाण काल) से संबंधित है।
इसी से कश्मीर नाम निकला।कश्मीर
का अच्छा-ख़ासा इतिहास कल्हण के ग्रन्थ राजतरंगिणी से (और बाद के अन्य लेखकों से)
मिलता है। प्राचीन काल में यहाँ हिन्दू आर्य राजाओं का राज था।
मौर्य सम्राट अशोक और कुषाण
सम्राट कनिष्क के समय कश्मीर बौद्ध धर्म और संस्कृति का मुख्य केन्द्र बन गया।
पूर्व-मध्ययुग में यहाँ के चक्रवर्ती सम्राट ललितादित्य ने एक विशाल साम्राज्य
क़ायम कर लिया था। कश्मीर संस्कृत विद्या का विख्यात केन्द्र रहा।
कश्मीर शैवदर्शन भी यहीं पैदा
हुआ और पनपा। यहाँ के महान मनीषीयों में पतञ्जलि, दृढबल, वसुगुप्त, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कल्हण, क्षेमराज
आदि हैं। यह धारणा है कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण एवं योग वासिष्ठ यहीं लिखे गये।
कश्मीर का
आश्वासन और देहावसान
1947 और 1948 का कश्मीर इतिहास
बहुत जटिल और विवादास्पद रहा है। इन वर्षों में कश्मीर के सम्राट महाराज हरि सिंह
ने न केवल अपने शासन का अंत देखा, बल्कि कश्मीर के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण
निर्णय लेने पड़े। महाराज हरि सिंह का शासन कश्मीर पर 1925 से 1947 तक रहा। वह
रणबीर सिंह के पोते थे, जो कि कश्मीर के पिछले सम्राट थे। 1947 में
जब ब्रिटिश सत्ता का अंत हुआ और भारत-पाकिस्तान विभाजन हुआ, तो कश्मीर
एक स्वतंत्र राज्य बन गया। महाराज हरि सिंह को कश्मीर के भविष्य पर निर्णय लेना था
- क्या वह भारत में शामिल हों या पाकिस्तान में।
1948 के अंत में संयुक्त राष्ट्र
ने युद्धविराम पर सहमति बनाई। हालाँकि, जब से संयुक्त राष्ट्र द्वारा
जनमत संग्रह की माँग की गई, भारत और पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में खटास
नहीं आई। इसके बाद 1965 और 1999 में कश्मीर पर दो और युद्ध हुए। महाराज हरि सिंह
का शासनकाल कश्मीर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके द्वारा लिए गए
निर्णयों ने न केवल कश्मीर के भविष्य को प्रभावित किया, बल्कि भारत
और पाकिस्तान के बीच संबंधों पर भी गहरा असर डाला। आज भी कश्मीर मुद्दा दोनों देशों
के बीच एक विवादास्पद विषय बना हुआ है, जिसका समाधान नहीं निकाला जा सका
है।
महाराज हरि सिंह का शासनकाल
कश्मीर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके द्वारा लिए गए निर्णयों ने न
केवल कश्मीर के भविष्य को प्रभावित किया, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच
संबंधों पर भी गहरा असर डाला। कश्मीर का मुद्दा आज भी दोनों देशों के बीच एक
विवादास्पद विषय बना हुआ है, जिसका कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकाला जा
सका है। महाराज हरि सिंह के शासनकाल में कश्मीर के भविष्य के बारे में लिए गए
निर्णय आज भी उनके इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।
जम्मू और
कश्मीर की समस्या जटिल इतिहास और वर्तमान
जम्मू और कश्मीर, भारत का एक
अभिन्न अंग,
हमेशा से
ही एक जटिल और विवादास्पद इलाका रहा है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, धार्मिक और
सांस्कृतिक विविधता, और राजनीतिक इतिहास ने इसे भारत-पाकिस्तान
संघर्ष का केंद्र बना दिया है।
वर्तमान स्थिति के अनुसार, जम्मू और
कश्मीर की पूर्व रियासत का लगभग आधा क्षेत्र भारत के नियंत्रण में है, जिसमें
जम्मू और कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। वहीं, पाकिस्तान एक तिहाई क्षेत्र को
नियंत्रित करता है, जो आज़ाद कश्मीर और गिलगित-बल्तिस्तान में
विभाजित है।
जम्मू और कश्मीर की समस्या का
इतिहास काफी पुराना है। यह इंग्लैंड के शासन काल में शुरू हुई और आज तक जारी है।
1947 में, जब भारत और
पाकिस्तान स्वतंत्र हुए, कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में शामिल
होने का फैसला किया। इसके बाद पाकिस्तान ने इस फैसले को चुनौती दी और कश्मीर के एक
हिस्से पर कब्जा कर लिया।
आज, जम्मू और
कश्मीर का विभाजन भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच फंसा हुआ है। इस
क्षेत्र में लगातार तनाव, हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता देखी जाती है।
कश्मीरी लोग लंबे समय से स्वायत्तता और स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं, लेकिन इस
मुद्दे पर कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर
को लेकर हुए युद्ध और संघर्ष ने इस क्षेत्र को एक खूनी और अस्थिर क्षेत्र बना दिया
है। अक्सर इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच झड़पें देखी जाती
हैं, जिसमें
बहुत से लोग मारे जाते हैं। यह स्थिति न केवल क्षेत्र के लोगों को प्रभावित करती
है, बल्कि
भारत-पाकिस्तान संबंधों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
इस जटिल समस्या का समाधान ढूंढ़ना
अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए भारत और पाकिस्तान को एक साथ काम करना होगा और
कश्मीरी लोगों की भावनाओं और आकांक्षाओं को ध्यान में रखना होगा। केवल इस तरह से
ही इस क्षेत्र में स्थायी शांति और सद्भाव स्थापित किया जा सकता है।
कश्मीर की पूर्व रियासत का
पूर्वी क्षेत्र भी एक सीमा विवाद में शामिल है, जो 19वीं
शताब्दी के अन्त में शुरू हुआ और 21वीं सदी में जारी रहा। हालाँकि कश्मीर की
उत्तरी सीमाओं पर ग्रेट ब्रिटेन, अफगानिस्तान
और रूस के बीच कुछ सीमा समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे, चीन ने कभी भी इन समझौतों को स्वीकार नहीं
किया और 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद चीन की आधिकारिक स्थिति नहीं बदली, जिसने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना
की। 1950 के दशक के मध्य तक चीनी सेना लद्दाख के उत्तर-पूर्वी हिस्से में प्रवेश
कर चुकी थी।
कश्मीर
त्रिराष्ट्रीय क्षेत्रीय विवाद
कश्मीर क्षेत्र का इतिहास लंबा
और जटिल है। यह क्षेत्र तीन देशों - भारत, पाकिस्तान और चीन - के बीच एक
विवादित भूमि है। इस क्षेत्र पर इन देशों का नियंत्रण विभाजित है और इस विवाद ने
कई युद्धों को जन्म दिया है।
भारत सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र
के अधिकांश हिस्से को नियंत्रित करता है, जिसमें साल्टोरो रिज पास भी
शामिल है। पाकिस्तान सॉल्टोरो रिज के दक्षिण-पश्चिम में निचले क्षेत्र को
नियंत्रित करता है।
विभाजन के अनुसार, भारत
101,338 वर्ग किलोमीटर, पाकिस्तान 85,846 वर्ग किलोमीटर और चीन
37,555 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को नियंत्रित करता है।
इस क्षेत्रीय विवाद ने कई
युद्धों को जन्म दिया है, जिनमें से प्रमुख हैं 1947-48 का पहला कश्मीर
युद्ध, 1965 का
दूसरा कश्मीर युद्ध, और 1999 का कारगिल युद्ध। विवाद अभी भी कायम
है और क्षेत्र में तनाव और हिंसा जारी है।
कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद और
सशस्त्र संघर्ष के कारण यह क्षेत्र दुनिया का एक "गरम क्षेत्र" माना
जाता है। इस विवाद ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को भी प्रभावित किया है। भारत, पाकिस्तान
और चीन के बीच इस मुद्दे पर सतत वार्ता और सहयोग की आवश्यकता है ताकि इस क्षेत्र
में स्थायी शांति और समृद्धि लाई जा सके।
कश्मीर क्षेत्रीय विवाद एक जटिल
और बहुआयामी मुद्दा है जिसका समाधान करना चुनौतीपूर्ण है। इस विवाद को हल करने के
लिए राजनीतिक,
सैन्य और
कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता है। साथ ही, मानवाधिकारों और स्थानीय जनता की
भलाई पर भी ध्यान देना जरूरी है। केवल इस तरह से ही इस क्षेत्र में स्थायी शांति
और समृद्धि लाई जा सकती है।
पीर पंजाल
रेंज के पार कश्मीर की विविधता
कश्मीर क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान
के बीच विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। हालांकि, यह विवाद केवल जम्मू और आज़ाद
कश्मीर तक ही सीमित नहीं है। पीर पंजाल पर्वतमाला के उत्तर में स्थित
गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र भी इस प्रकार के राजनीतिक और सामाजिक तनावों से घिरा
हुआ है।
गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र का
इतिहास काफी विस्तृत और जटिल है। यह क्षेत्र काराकोरम, पश्चिमी
हिमालय, पामीर और
हिन्दू कुश पर्वतमाला से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र में विभिन्न जनजातीय समूह और
संस्कृतियाँ प्रवासी होकर आई हैं, जिन्होंने यहाँ की संस्कृति को समृद्ध और
विविध बना दिया है।
गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में
पारंपरिक रूप से कई भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें शुमाल, बाल्टी, हुन्जा, नागर और
गुजर शामिल हैं। इन भाषाओं के अलावा, उर्दू और अंग्रेजी भी इस क्षेत्र
में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती हैं। इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति में धार्मिक
विविधता भी देखी जा सकती है। यहाँ पर इस्लाम, हिन्दूवाद, बौद्धधर्म
और शिखिज्म जैसे विभिन्न धर्म प्रचलित हैं।
आर्थिक दृष्टि से गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र काफी संपन्न है। यहाँ पर कृषि, पशुपालन, खनन और पर्यटन जैसे उद्योग फल-फूल रहे हैं। हालांकि, यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील है और पाकिस्तानी शासन के अधीन है। इस कारण से यहाँ के लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
जम्मू और आज़ाद कश्मीर के विपरीत, गिलगित-बाल्टिस्तान
क्षेत्र में लोगों की जीवनशैली और संस्कृति काफी भिन्न है। यहाँ की प्राकृतिक
सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता कश्मीर घाटी के साथ-साथ उत्तर के इस क्षेत्र को भी
एक अलग पहचान प्रदान करती है। हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता और कई अन्य
चुनौतियों के कारण, इस क्षेत्र का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है।
भविष्य में इस क्षेत्र के लोगों को सशक्त बनाकर, उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने और
समृद्धि प्राप्त करने की दिशा में काम करना होगा।
लद्दाख
हिमालय की शीर्षस्थ धरती
लद्दाख, भारत का एक
अद्भुत क्षेत्र,
उत्तर में
कुनलुन पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में मुख्य महान हिमालय के बीच स्थित है। इस
व्यापक और विविध भौगोलिक दृश्य में, राजधानी शहर लेह और कारगिल निवास
करते हैं। यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के अधीन है और 2019 तक जम्मू और कश्मीर राज्य
का हिस्सा था।
लद्दाख की जनसंख्या मुख्य रूप से
भारोपीय और तिब्बती मूल के लोगों द्वारा बसी हुई है। इस क्षेत्र में आबादी का एक
बड़ा हिस्सा है और यह हिमालय क्षेत्र में सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक
है।
लद्दाख का भौगोलिक दृश्य अद्भुत है। यहाँ अक्साई चिन नामक एक विशाल उच्च ऊंचाई वाला रेगिस्तान है, जो 5,000 मीटर (16,000 फीट) तक ऊंचाई तक पहुंचता है। यह तिब्बती पठार का हिस्सा है और सोडा मैदान के रूप में जाना जाता है। यह क्षेत्र लगभग निर्जन है और इसमें कोई स्थायी बस्ती नहीं है।
लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता और
शांत वातावरण इसे पर्यटकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाते हैं। यहाँ पर्वतीय
परिदृश्य, ज्वालामुखी, झीलें, और प्राचीन
सांस्कृतिक विरासत मौजूद हैं। लेह और कारगिल क्षेत्र में कई प्राचीन मठ और गुंबद
हैं, जो बौद्ध
धर्म की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
लद्दाख की भौगोलिक विविधता और
सांस्कृतिक धरोहर इसे भारत के सबसे अनूठे और आकर्षक क्षेत्रों में से एक बनाती है।
इस क्षेत्र की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण पर्यटकों को आकर्षित करते
हैं और इसे एक अविस्मरणीय यात्रा का अनुभव प्रदान करते हैं।
भारत और
पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र
कश्मीर क्षेत्र भारत और
पाकिस्तान के बीच सदियों से एक विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा रहा है। यद्यपि यह
क्षेत्र आज अलग-अलग देशों के प्रशासन के अधीन है, लेकिन न तो भारत और न ही
पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से दूसरे देश द्वारा दावा किए गए क्षेत्रों के उपयोग को
मान्यता दी है।
1947 के भारत-पाक युद्ध के बाद
कश्मीर की मौजूदा सीमाएं बनीं, जिसमें पाकिस्तान ने कश्मीर का एक तिहाई
हिस्सा अपने कब्जे में रख लिया, जबकि भारत ने एक-आध हिस्सा संयुक्त राष्ट्र
द्वारा स्थापित नियंत्रण रेखा के साथ हासिल किया। 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद
भी गतिरोध जारी रहा और संयुक्त राष्ट्र के बीच युद्धविराम हुआ।
कश्मीर क्षेत्र पर भारत और
पाकिस्तान के बीच कई दशकों से जारी संघर्ष ने न केवल इन दोनों देशों के बीच तनाव
बढ़ाया है,
बल्कि इस
क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन को भी प्रभावित किया है। कश्मीर में सुरक्षा
बलों और स्थानीय लोगों के बीच लगातार टकराव और हिंसक घटनाएं हुई हैं, जिससे
कश्मीरी नागरिकों का जीवन बदतर होता जा रहा है।
इस विवाद का समाधान खोजने के लिए
कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल
सका है। भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ताएं कई बार हुई हैं, लेकिन किसी
भी पक्ष को अपनी मांगों पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं देखा गया है। संयुक्त
राष्ट्र ने भी कश्मीर मुद्दे पर कई प्रस्ताव पारित किए हैं, लेकिन उनका
कार्यान्वयन नहीं हो सका।
इस मुद्दे पर स्थायी समाधान
खोजने के लिए भारत और पाकिस्तान को सहमति बनानी होगी और दोनों देशों को अपने
राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर कश्मीरी लोगों की भावनाओं और आकांक्षाओं पर ध्यान
देना होगा। केवल तभी कश्मीर क्षेत्र में शांति और सुरक्षा की स्थिति बन सकेगी और
वहां के लोग स्वतंत्रता और समृद्धि का आनंद ले सकेंगे।
कश्मीर एक
स्वर्गीय भूभाग
कश्मीर भारत का एक प्रमुख राज्य
है, जो अपनी
अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक विरासत के लिए
विख्यात है। यह ख़ूबसूरत भूभाग मुख्यतः झेलम नदी की घाटी (वादी) में बसा है।
कश्मीर को 'धरती का स्वर्ग' कहा जाता है।
"गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं
अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं
अस्त।"
(अगर स्वर्ग पृथ्वी पर कहीं है, तो यही है, यही है, यही है।)
कश्मीर की प्राकृतिक सुन्दरता का
वर्णन करते हुए एक नहीं, कई कवियों ने इस भूभाग की प्रशंसा की है।
यहाँ की झीलों,
बर्फीले
पर्वतों, हरे-भरे
बागों और बहती नदियों ने कई कवियों को प्रेरित किया है।
कश्मीर न केवल प्राकृतिक सौंदर्य
के लिए, बल्कि अपनी
धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए भी विख्यात है। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध और
सिख धर्मों के कई महत्वपूर्ण स्थल हैं। कश्मीरी संस्कृति में लोक-गीत, नृत्य, वस्त्र और
खाद्य पदार्थों का महत्वपूर्ण स्थान है। कश्मीरी काशमीरी शॉल, कारपेट और
फ़र्नीचर विश्व प्रसिद्ध हैं।
इस सुन्दर प्रदेश में अनगिनत
पर्यटक आकर्षित होते हैं। वे यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक
स्थलों और अद्भुत संस्कृति का आनंद लेते हैं। कश्मीर अपनी अद्वितीय पहचान के साथ
भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है।
कश्मीर एक
प्राचीन संस्कृति का गौरव
कश्मीर में काफ़ी समय से एक
प्राचीन और समृद्ध संस्कृति का विकास हुआ है। यह क्षेत्र एशिया में सांस्कृतिक और
दार्शनिक विचारों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि
इस विस्तृत घाटी में कभी एक सुंदर झील थी, जिसके तट पर देवताओं का वास था।
एक दिन किसी असुर ने इस झील में आकर बसना शुरू कर दिया और देवताओं को परेशान करना
प्रारंभ कर दिया। परेशान होकर देवताओं ने ऋषि कश्यप से प्रार्थना की कि वह इस असुर
का विनाश करें। ऋषि कश्यप ने अपने तप के बल से उस झील को रिक्त कर दिया, जिससे असुर
का अंत हो गया और उस स्थान पर घाटी का निर्माण हो गया। इस कारण ही इस घाटी को
कश्यप मार या कश्मीर कहा जाने लगा।
मुगल सल्तनत के गिरने के बाद
कश्मीर जम्मू के हिंदू डोगरा राजाओं के अधिकार में चला गया। ब्रिटिश शासन के दौरान
डोगरा राजा गुलाब सिंह ने ब्रिटिश लोगों के साथ एक संधि करके कश्मीर पर अपना
अधिकार जमा लिया। यह डोगरा वंश भारत की आज़ादी तक कायम रहा।
कश्मीर, सदियों से
एशिया में संस्कृति और दर्शनशास्त्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ की
सांस्कृतिक विरासत में सूफी संतों का दर्शन भी एक महत्वपूर्ण अंग है। इस क्षेत्र
में काफी समय तक धर्मनिरपेक्ष माहौल रहा, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और
अन्य धर्मों के लोग एक साथ रहते थे। लेकिन समय के साथ कश्मीर में उठे कुछ राजनीतिक
द्वंद्व ने इस क्षेत्र को कई दशकों तक प्रभावित किया। इस क्षेत्र की प्राचीन और
समृद्ध संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, ताकि कश्मीर एक बार फिर से शांति, समृद्धि और
ज्ञान का केंद्र बन सके।
खरीदारी और
खानपान का जादुई संगम
कश्मीर न केवल अपनी बेमिसाल
प्राकृतिक सुंदरता से मशहूर है, बल्कि यह पर्यटकों के लिए एक अद्वितीय
खरीदारी और खानपान का स्थान भी है। इस प्रसिद्ध प्रदेश में, विविध
सांस्कृतिक और कारीगरी की धरोहर को देखने और अनुभव करने का एक अद्भुत अवसर मिलता
है।
कश्मीर में कई सरकारी एम्पोरियम
हैं, जहाँ
पर्यटक अनेक यादगार वस्तुएँ खरीद सकते हैं। अखरोट की लकड़ी के हस्तशिल्प, पेपरमेशी
के शो-पीस,
लेदर की
वस्तुएँ, कालीन, पश्मीना
एवं जामावार शाल, केसर, क्रिकेट बैट और सूखे मेवे आदि
यहाँ की प्रमुख खरीदारी की वस्तुएँ हैं। लाल चौक क्षेत्र में विविध प्रकार के
शॉपिंग केन्द्र मौजूद हैं, जहाँ पर्यटक इन सभी उत्पादों को खरीद सकते हैं।
कश्मीर की खरीदारी और खानपान की
विविधता पर्यटकों को अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। यह प्रदेश अपनी सांस्कृतिक और
कारीगरी की विरासत के साथ-साथ, स्वादिष्ट कश्मीरी भोजन का भी लुत्फ उठाने का
एक अद्भुत अवसर प्रस्तुत करता है। कश्मीर का यह संगम पर्यटकों को अविस्मरणीय यादें
देकर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है।
भारत की
आज़ादी और कश्मीर में धार्मिक असंतुलन
भारत की आज़ादी के समय कश्मीर की
वादी में लगभग 15% हिन्दू थे और बाकी मुसल्मान। आतंकवाद शुरू होने के बाद आज
कश्मीर में केवल 4% हिन्दू बचे हैं, यानि कि वादी में 96% मुस्लिम
बहुमत है। यह एक चिंताजनक स्थिति है और इसका गहरा इतिहास और परिणाम है।
कश्मीर की वादी में धार्मिक
संरचना में आए इस बदलाव की कई वजहें हैं। सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण वजह है
कश्मीर में लगातार चले आ रहे आतंकवाद का खतरा। कश्मीर में 1989 से लगातार आतंकवाद
जारी है, जिसमें कई
हिन्दू नागरिकों को निशाना बनाया गया है और उन्हें बलपूर्वक घरों से बाहर किया गया
है। इसका सबसे बड़ा नतीजा यह हुआ कि लगभग 3.5 लाख हिन्दू कश्मीर छोड़कर भाग गए और
वादी में उनकी संख्या कम होती गई।
साथ ही, कश्मीर में
आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता का अभाव भी हिन्दुओं के पलायन का एक कारण रहा है। लंबे
समय से चले आ रहे संघर्ष और अस्थिरता ने कश्मीर में हिन्दुओं के लिए जीवन कठिन बना
दिया है। इससे भी कई हिन्दू कश्मीर छोड़कर भाग गए।
लेकिन एक बात स्पष्ट है कि
ज़्यादातर मुसल्मानों और हिन्दुओं का आपसी बर्ताव भाईचारे वाला ही होता है।
कश्मीरी लोग खुद काफ़ी खूबसूरत होते हैं और उनकी संस्कृति और परंपराएं बहुत समृद्ध
हैं। यह संकट एक धार्मिक संकट है, लेकिन इसके पीछे कई राजनीतिक और सांस्कृतिक
कारण भी हैं।
भारत सरकार और राज्य सरकार को
मिलकर इस संकट से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति बनानी चाहिए। हिन्दुओं को वापस
लाने के साथ-साथ कश्मीर में सामाजिक सौहार्द और सद्भाव को बढ़ावा देने की जरूरत
है। धार्मिक संकट को राजनीतिक संकट में न बदलने दिया जाए और कश्मीरी लोगों को एक
सुरक्षित और समृद्ध भविष्य दिया जाए।
कश्मीर की
सूफ़ी-परम्परा एक अनूठा संगम
कश्मीर, भारत के
उत्तरी राज्यों में से एक, अपनी अनूठी संस्कृति और परम्पराओं के लिए
विश्व भर में जाना जाता है। इस रिज़ॉर्ट स्थल की खासियत यह है कि यहां की
सूफ़ी-परम्परा बहुत प्रसिद्ध है, जो कश्मीरी इस्लाम को परम्परागत शिया और
सुन्नी इस्लाम से थोड़ा अलग और हिन्दुओं के प्रति सहिष्णु बना देती है।
आतंकवाद से बशक इन सभी को और
कश्मीरियों की खुशहाली को बहद धक्का लगा है, लेकिन कश्मीरी संस्कृति और
परम्पराएं अब भी मज़बूती से कायम हैं। कश्मीरी व्यंजन भारत भर में बहुत ही लज़ीज़
माने जाते हैं। मांसाहारी व्यंजनों में कई तरह के कबाब और कोफ़्ते, रिश्ताबा, गोश्ताबा, इत्यादि
शामिल हैं। परम्परागत कश्मीरी दावत को वाज़वान कहा जाता है। कहते हैं कि हर
कश्मीरी की ये ख्वाहिश होती है कि ज़िन्दगी में एक बार, कम से कम, अपने
दोस्तों के लिये वो वाज़वान परोसे।
कुल मिलाकर कहा जाये तो कश्मीर
हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियों का अनूठा मिश्रण है। यहाँ की सूफ़ी-परम्परा और धार्मिक
सहिष्णुता कश्मीरी जीवन-शैली का अभिन्न अंग है। इसी अनूठे मिश्रण ने कश्मीर को एक
अटूट पहचान दी है, जिसे आतंकवाद जैसी कुरीतियों से बचाया जाना
चाहिए।
कश्मीर -
हिमालय का स्वर्गीय कोना
कश्मीर, भारत का
सुंदरतम प्रदेश,
ग्रेट
हिमालयन रेंज और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के बीच में स्थित है। यहां की नैसर्गिक
सुंदरता हर मौसम में अद्भुत रूप धारण करती है।
यही कारण है कि कश्मीर देश-विदेश
के पर्यटकों को आकर्षित करता है। थॉमस मूर की प्रसिद्ध पुस्तक 'लैला रूख' ने कश्मीर
की इन अद्भुत खूबियों का परिचय पूरे विश्व से कराया था।
कश्मीर में घूमने के लिए कई
आकर्षक स्थल हैं, जैसे - दल झील, शरीन शाह का महल, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम, वर्वन और
कई अन्य। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य, नदियाँ, झीलें और
पहाड़ मन को मोह लेते हैं। कश्मीरी संस्कृति, लोक गीत, नृत्य और
खाने-पीने की विविधता भी इस प्रदेश की खूबियों में शामिल हैं।
कश्मीर में प्रकृति के साथ-साथ
धार्मिक स्थल भी हैं, जैसे - श्रीनगर का जामा मस्जिद, श्री
अमरनाथ गुफा,
सोनामर्ग
के गुफा मंदिर और कई अन्य। ये स्थल सनातन धर्म, इस्लाम और बौद्ध धर्म का समन्वय
प्रदर्शित करते हैं।
भारत की स्वतंत्रता के समय
कश्मीर के शासक हरि सिंह थे। उस दौर में मुख्य राजनीतिक पार्टी शेख अब्दुल्ला के
नेतृत्व में मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस (बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस) थी। कश्मीरी पंडित, शेख
अब्दुल्ला और राज्य के अधिकांश मुसलमान कश्मीर का भारत में ही विलय चाहते थे। लेकिन
पाकिस्तान को यह स्वीकार नहीं था कि कोई मुस्लिम-बहुल प्रांत भारत में रहे, क्योंकि
इससे उसके दो-राष्ट्र सिद्धांत को ठेस लगती थी।
1947-48 में पाकिस्तान ने कबाइली
और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और काफ़ी हिस्सा हथिया लिया। इस
समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने मोहम्मद अली जिन्ना से जनमत-संग्रह से विवाद
सुलझाने की पेशकश की, लेकिन जिन्ना ने उस समय इसे ठुकरा दिया
क्योंकि वह अपनी सैनिक कार्रवाई पर पूरा भरोसा करते थे। इसके बाद महाराजा ने शेख
अब्दुल्ला की सहमति से कुछ शर्तों के तहत भारत में विलय कर दिया।
लेकिन दोनों में से कोई भी
संकल्प अभी तक लागू नहीं हो पाया है। इस प्रकार कश्मीर का विवाद आज भी जारी है और
इससे संबंधित तनाव भारत-पाकिस्तान संबंधों को प्रभावित करता रहा है। इस विषय पर
अधिक जानकारी के लिए आप इतिहास किताबों या विश्वसनीय ऑनलाइन स्रोतों का अध्ययन कर
सकते हैं।
भारतीय
पक्ष के अनुसार कश्मीर की लम्बी और जटिल कहानी
कश्मीर एक अद्भुत और रोमांचक क्षेत्र है जिसका इतिहास कई सदियों पुराना है। जम्मू और कश्मीर की लोकतांत्रिक और निर्वाचित संविधान-सभा ने 1957 में एकमत से महाराजा के विलय के कागजात को हामी दे दी और राज्य का ऐसा संविधान स्वीकार किया जिसमें कश्मीर के भारत में स्थायी विलय को मान्यता दी गयी थी।
कई चुनावों में कश्मीरी जनता ने
वोट डालकर भारत का साथ दिया है। भारतीय फौज की नये सिपाहियों के भर्ती अभियान में
हजारों कश्मीरी नवयुवक आते हैं, जो भारत के साथ अपनी निष्ठा का प्रमाण है।
भारत पाकिस्तान के दो-राष्ट्र
सिद्धांत को नहीं मानता। भारत स्वयं पंथनिरपेक्ष है और कश्मीर का भारत में विलय
ब्रिटिश "भारतीय स्वातंत्र्य अधिनियम" के तहत कानूनी तौर पर सही था।
दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी भूमि पर आतंकवादी शिविर चला रहा है, खासकर 1989 से, और कश्मीरी युवकों को भारत के खिलाफ़ भड़का रहा है। ज़्यादातर आतंकवादी स्वयं पाकिस्तानी नागरिक (या तालिबानी अफ़गान) ही हैं। ये और कुछ कश्मीरी मिलकर इस्लाम के नाम पर भारत के ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ रखे हैं। लगभग सभी कश्मीरी पण्डितों को आतंकवादियों ने वादी के बाहर निकाल दिया है और वो शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।
राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत स्वायत्ता प्राप्त है, जिसके तहत कोई गैर-कश्मीरी यहाँ जमीन नहीं खरीद सकता था। हालांकि, 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35A को हटा दिया गया, जिसके बाद कोई भी गैर-कश्मीरी वहां जमीन खरीद सकता है। यह एक महत्वपूर्ण विकास है जिसकी उम्मीद की जा रही है।
कश्मीर की समस्या जटिल और
बहुआयामी है,
जिसमें
राजनीतिक, सैन्य, सामाजिक और
आर्थिक पहलू शामिल हैं। भारत लगातार इस मुद्दे पर कश्मीरी जनता के साथ खड़ा है और
उनके हितों की रक्षा करने में लगा हुआ है। उम्मीद है कि इस क्षेत्र में शांति और
समृद्धि का युग आएगा।
कश्मीर:
भारत का अभिन्न अंग
कश्मीर की समस्या एक ऐतिहासिक और
गंभीर विषय है,
जिसमें कई
पहलू शामिल हैं। इस लेख में हम कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति पर
चर्चा करेंगे।
कश्मीर का
ऐतिहासिक महत्व
कश्मीर की धरती पर सैकड़ों
वर्षों से हिन्दू राजाओं का शासन रहा है। यह क्षेत्र भारतीय सभ्यता और संस्कृति का
अभिन्न हिस्सा रहा है। कश्मीर में हिन्दू धर्म, संस्कृति और प्रथाओं का गहरा
प्रभाव रहा है। इस क्षेत्र में विशाल हिन्दू मंदिर, मठ और धार्मिक स्थल मौजूद हैं।
विदेशी
आक्रमणों के कारण स्थिति में बदलाव
लेकिन कुछ विदेशी आक्रमणों के
कारण कश्मीर क्षणिक रूप से मुस्लिम बहुल क्षेत्र बन गया। इस कारण से कश्मीर को
लेकर एक विवाद और समस्या उत्पन्न हो गई। भारत के पास कश्मीर का पूर्ण अधिकार है, क्योंकि यह
हमेशा से भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है।
भारत में
मुसलमानों की स्थिति
यह सच है कि पाकिस्तान में
मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। लेकिन कश्मीर का धार्मिक महत्व अब कम हो गया
है। कुछ पाकिस्तानी राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस मुद्दे को गरम करते
रहते हैं, ताकि वे
अपनी आवाम का ध्यान महंगाई और अन्य घरेलू मुद्दों से भटका सकें।
वर्तमान
स्थिति और समाधान
वर्तमान में कश्मीर में स्थिति
काफी जटिल है। पाकिस्तान द्वारा लगातार किए जा रहे आतंकवादी हमलों के कारण यह
क्षेत्र अस्थिर बना हुआ है। लेकिन भारत सरकार ने इस क्षेत्र में शांति और विकास के
लिए कई कदम उठाए हैं।
कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है
और इसे हमेशा से ही ऐसा ही माना जाना चाहिए। हम सभी को मिलकर इस विवाद को सुलझाने
और कश्मीर को स्थायी शांति प्राप्त करने के लिए प्रयास करने चाहिए।
पं॰ नेहरू
और माउन्टबेटन: एक सूचनात्मक संबंध
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में
पं॰ नेहरू और माउन्टबेटन के बीच एक विशेष संबंध था। यह संबंध किसी भी अन्य भारतीय
कांग्रेसी या मुस्लिम नेता के बीच नहीं था। पं॰ नेहरू के प्रयासों से ही
माउण्टबेटन को स्वतन्त्र भारत का पहला गर्वनर जनरल बनाया गया, जबकि
जिन्ना ने माउण्टबेटन को पाकिस्तान का पहला गर्वनर जनरल मानने से साफ इन्कार कर
दिया, जिसका
माउण्टेबटन को जीवन भर अफसोस भी रहा।
माउन्टबेटन मार्च 24, 1947 से
जून 30, 1948 तक
भारत में रहे। इन पन्द्रह महीनों में वह न केवल संवैधानिक प्रमुख रहे बल्कि भारत
की महत्वपूर्ण नीतियों का निर्णायक भी रहे। पं॰ नेहरू उन्हें सदैव अपना मित्र, मार्गदर्शक
तथा महानतम सलाहकार मानते रहे। वह भी पं॰ नेहरू को एक "शानदार", "सर्वदा
विश्वसनीय" "कल्पनाशील" तथा "सैद्धान्तिक समाजवादी"
मानते रहे।
महाराजा
हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला और पं॰ नेहरू के
मध्य संघर्ष
कश्मीर का इतिहास हमेशा से ही
जटिल और विवादास्पद रहा है। इसमें कई प्रमुख घटनाएं और व्यक्तित्व शामिल हैं, जिन्होंने
इस क्षेत्र के भविष्य को प्रभावित किया है। इन में से तीन प्रमुख व्यक्तित्व हैं -
महाराजा हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला और पं॰ नेहरू।
दुर्भाग्य से, इन तीनों
के बीच संबंध कभी भी अच्छे नहीं रह पाए। महाराजा हरि सिंह कश्मीर के अंतिम शासक थे, जिन्होंने 1947 में भारत
में विलय का फैसला किया था। वे शेख अब्दुल्ला की कुटिल चालों, स्वार्थी और
अलगाववादी सोच से परिचित थे। वे जानते थे कि "क्विट कश्मीर आंदोलन" के
द्वारा शेख अब्दुल्ला महाराजा को हटाकर, स्वयं शासन संभालने को आतुर है।
वहीं, पं॰ नेहरू
भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए थे, तब एक घटना ने इस कटुता को और
बढ़ा दिया था। शेख अब्दुल्ला ने श्रीनगर की एक कांफ्रेंस में पं॰ नेहरू को आने का
निमंत्रण दिया था, जिसमें मुख्य प्रस्ताव महाराजा कश्मीर को
हटाने का था। मजबूर होकर महाराजा ने पं॰ नेहरू से इस कांफ्रेंस में न आने को कहा।
पर न मानने पर पं॰ नेहरू को जम्मू में ही श्रीनगर जाने से पूर्व रोक दिया गया। पं॰
नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और जीवन भर इसे नहीं भूले।
इन तीनों के बीच इस तरह के
संघर्ष और विवाद ने कश्मीर की समस्या को और जटिल बना दिया। अभी भी भारत और कश्मीर
में इस विवाद के परिणाम देखने को मिलते हैं। इतिहास से सीखने की जरूरत है कि कैसे
व्यक्तिगत स्वार्थ और राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र को
अस्थिर कर दिया।
इन तीन शक्तिशाली व्यक्तियों के
बीच के संघर्ष ने कश्मीर की जनता को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। आज भी कश्मीर में
हिंसा और असंतोष का माहौल कायम है। इस जटिल समस्या का समाधान निकालने के लिए, इतिहास से
सबक लेने और वर्तमान के राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है।
पं. नेहरू
का व्यक्तित्व और कश्मीर का मुद्दा
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के
महानायक और भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व
राष्ट्रीय होने के साथ-साथ अत्यंत व्यक्तिगत भी था। उनके जीवन और कार्यों का
विश्लेषण करने पर यह बात स्पष्ट होती है कि कश्मीर का मुद्दा उन्हें हमेशा से
भावुक कर देता था। इस संबंध में कई उदाहरण मिलते हैं, जिनसे यह
स्पष्ट होता है कि कश्मीर के प्रति उनका व्यक्तिगत लगाव उनके राष्ट्रीय नेतृत्व पर
प्रभाव डालता था।
कश्मीर के मुद्दे पर नेहरू की
भावुकता का एक उदाहरण यह है कि जबकि उन्होंने देश के 560 छोटे-बड़े
राज्यों के विलय का महान दायित्व सरदार पटेल को सौंपा था, वहीं केवल
कश्मीरी दस्तावेजों को अपने कब्जे में रखा। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे कश्मीर
के मुद्दे पर केंद्रीय प्रशासन की सलाह तक सुनने को तैयार नहीं थे। इसी संबंध में
तत्कालीन विदेश सचिव वाई॰डी॰ गुणडेवीय ने यह प्रसिद्ध कथन किया था कि "आप
प्रधानमंत्री से कश्मीर पर बात न करें। कश्मीर का नाम सुनते ही वे अचेत हो जाते
हैं।"
नेहरू की कश्मीर पर भावुकता का
एक और उदाहरण है कि 1958 में जब एक प्रतिनिधिमण्डल के साथ मैं उनके
निवास तीन मूर्ति गया, तब स्कूल के बच्चों ने उनके सामने कश्मीर पर
पाकिस्तान को चुनौती देते हुए एक गीत प्रस्तुत किया। इसमें "कश्मीर भला तू
क्या लेगा?"
कहा गया
था। यह सुनते ही नेहरू तिलमिला गए और गीत को बीच में ही बंद करने को कह दिया।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता
है कि कश्मीर का मुद्दा नेहरू के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत संवेदनशील था। उनका
कश्मीर से व्यक्तिगत लगाव उनके राष्ट्रीय नेतृत्व पर गहरा प्रभाव डालता था। संभवत:
यही कारण है कि कश्मीर के मुद्दे पर उनका रवैया कुछ कठोर नहीं था और उन्होंने
कश्मीर के मुद्दे को हल करने में कुछ कमी रह गई।
नेहरू का व्यक्तित्व एक महान
राष्ट्रीय नेता का था, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर उनकी व्यक्तिगत
भावुकता उनके राष्ट्रीय नेतृत्व पर प्रभाव डालती थी। इसलिए कश्मीर के मुद्दे पर
उनका रवैया कुछ कठोर नहीं था और वे इस मुद्दे को हल करने में कुछ कमी रह गई। यह एक
ऐसा पहलू है जिसपर विद्वानों ने अभी तक गहराई से विचार नहीं किया है।
भारत के
विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के पूर्व कश्मीर की स्थिति
भारत के विभाजन और पाकिस्तान के
निर्माण के समय कश्मीर की स्थिति काफी जटिल और उलझी हुई थी। कश्मीर के महाराजा हरि
सिंह कश्मीर को भारत के साथ विलय करना चाहते थे, जबकि पाकिस्तान के क्रिएटर
मुहम्मद अली जिन्ना कश्मीर तथा हैदराबाद पर पाकिस्तान का आधिपत्य चाहते थे।
जिन्ना ने अपने सैन्य सचिव को
कश्मीर के महाराजा से मिलने के लिए तीन बार भेजा। कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री
काक ने भी जिन्ना से मिलाने का वायदा किया था। लेकिन महाराजा हरि सिंह ने बार-बार बीमारी
का बहाना बनाकर बातचीत को टाल दिया। जिन्ना ने गर्मियों की छुट्टी कश्मीर में
बिताने की इजाजत भी मांगी थी, लेकिन महाराजा ने विनम्रतापूर्वक इस आग्रह को
टाल दिया, कहते हुए
कि वह एक पड़ोसी देश के गर्वनर जनरल को ठहराने की औपचारिकता पूरी नहीं कर पाएंगे।
दूसरी ओर, कश्मीर के
नेता शेख अब्दुल्ला गद्दी हथियाने और इसे एक मुस्लिम प्रदेश (देश) बनाने को आतुर
थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अपमानित महसूस कर रहे थे। उधर, ब्रिटिश
गवर्नर जनरल माउंटबेटन भी जून में तीन दिन कश्मीर में रहे थे। शायद वे कश्मीर का
विलय पाकिस्तान में चाहते थे, क्योंकि उन्होंने मेहरचंद महाजन से कहा था कि
"भौगोलिक स्थिति" को देखते हुए कश्मीर के पाकिस्तान का भाग बनना उचित
है।
इस संदर्भ में, श्री
गुरुजी (माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर) ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 18 अक्टूबर
को श्रीनगर पहुंचे और महाराजा कश्मीर से बातचीत की। इस विचार-विमर्श के पश्चात, महाराजा
कश्मीर अपनी रियासत के भारत में विलय के पक्ष में हो गए थे।
कश्मीर की इस जटिल स्थिति में, विभिन्न
पक्षों के मध्य तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो गया था। महाराजा हरि सिंह कश्मीर को
भारत के साथ विलय करना चाहते थे, जबकि पाकिस्तान और शेख अब्दुल्ला कश्मीर पर
अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। इस संघर्ष में, श्री
गुरुजी की भूमिका महत्वपूर्ण रही, जिन्होंने महाराजा कश्मीर को भारत के साथ
विलय के लिए राजी किया।
कश्मीर की इस जटिल स्थिति ने
भविष्य में कई संघर्षों और विवादों को जन्म दिया, जिनका असर आज भी देखा जा रहा है।
इस समस्या को लेकर पाकिस्तान और भारत के बीच लगातार तनाव बना हुआ है, और कश्मीर
अक्सर इन दोनों देशों के द्वंद्व का केंद्र बना रहा है। कश्मीर की स्थिति और उसके
भविष्य पर चर्चा आज भी जारी है, और इस जटिल मुद्दे पर एक स्थायी समाधान खोजने
की कोशिशें किए जा रही हैं।
कश्मीर का
संघर्ष: भारत और पाकिस्तान के बीच द्वंद्व का इतिहास
जब षड्यंत्रों से बात नहीं बनी
तो पाकिस्तान ने बल प्रयोग द्वारा कश्मीर को हथियाने की कोशिश की तथा अक्टूबर 22, 1947 को
सेना के साथ कबाइलियों ने मुजफ्फराबाद की ओर कूच किया। लेकिन कश्मीर के नए
प्रधानमन्त्री मेहरचन्द्र महाजन के बार-बार सहायता के अनुरोध पर भी भारत सरकार
उदासीन रही। भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने भी इस सन्दर्भ में कोई पूर्व जानकारी
नहीं दी। कश्मीर के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने बिना वर्दी के 250 जवानों के साथ
पाकिस्तान की सेना को रोकने की कोशिश की तथा वे सभी वीरगति को प्राप्त हुए। आखिर
24 अक्टूबर को माउण्टबेटन ने "सुरक्षा कमेटी" की बैठक की। परन्तु बैठक
में महाराजा को किसी भी प्रकार की सहायता देने का निर्णय नहीं किया गया। 26
अक्टूबर को पुन: कमेटी की बैठक हुई। अध्यक्ष माउन्टबेटन अब भी महाराजा के
हस्ताक्षर सहित विलय प्राप्त न होने तक किसी सहायता के पक्ष में नहीं थे। आखिरकार
26 अक्टूबर को सरदार पटेल ने अपने सचिव वी॰पी॰ मेनन को महाराजा के हस्ताक्षर युक्त
विलय दस्तावेज लाने को कहा। सरदार पटेल स्वयं वापसी में वी॰पी॰ मेनन से मिलने हवाई
अड्डे पहुँचे। विलय पत्र मिलने के बाद 27 अक्टूबर को हवाई जहाज द्वारा श्रीनगर में
भारतीय सेना भेजी गई।
'दूसरे, जब भारत की
विजय-वाहिनी सेनाएं कबाइलियों को खदेड़ रही थीं। सात नवम्बर को बारहमूला कबाइलियों
से खाली करा लिया गया था परन्तु पं॰ नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की सलाह पर तुरन्त
युद्ध विराम कर दिया। परिणामस्वरूप कश्मीर का एक तिहाई भाग जिसमें मुजफ्फराबाद, पुंछ, मीरपुर, गिलागित
आदि क्षेत्र आते हैं, पाकिस्तान के पास रह गए, जो आज
पाकिस्तान द्वारा "आजाद कश्मीर" के नाम से पुकारे जाते हैं।
तीसरे, माउन्टबेटन
की सलाह पर पं॰ नेहरू एक जनवरी, 1948 को कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ
की सुरक्षा परिषद् में ले गए। सम्भवत: इसके द्वारा वे विश्व के सामने अपनी
ईमानदारी छवि का प्रदर्शन करना चाहते थे तथा विश्वव्यापी प्रतिष्ठा प्राप्त करना
चाहते थे। पर यह प्रश्न विश्व पंचायत में युद्ध का मुद्दा बन गया।
चौथी भयंकर भूल पं॰ नेहरू ने तब
की जबकि देश के अनेक नेताआें के विरोध के बाद भी, शेख अब्दुल्ला की सलाह पर भारतीय
संविधान में धारा 370 जुड़ गई। न्यायाधीश डी॰डी॰ बसु ने इस धारा को असंवैधानिक तथा
राजनीति से प्रेरित बतलाया। डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने इसका विरोध किया तथा स्वयं इस
धारा को जोड़ने से मना कर दिया। इस पर प्रधानमन्त्री पं॰ नेहरू ने रियासत
राज्यमन्त्री गोपाल स्वामी आयंगर द्वारा अक्टूबर 17, 1949 को यह प्रस्ताव रखवाया।
इसमें कश्मीर के लिए अलग संविधान को स्वीकृति दी गई जिसमें भारत का कोई भी कानून
यहां की विधानसभा द्वारा पारित होने तक लागू नहीं होगा। दूसरे शब्दों में दो
संविधान, दो प्रधान
तथा दो निशान को मान्यता दी गई। कश्मीर जाने के लिए परमिट की अनिवार्यता की गई।
शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमन्त्री बने। वस्तुत: इस धारा के जोड़ने से बढ़कर
दूसरी कोई भयंकर गलती हो नहीं सकती थी।
पांचवीं भयंकर भूल शेख अब्दुल्ला
को कश्मीर का "प्रधानमन्त्री" बनाकर की। उसी काल में देश के महान
राजनेता डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दो विधान, दो प्रधान, दो निशान
के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन किया। वे परमिट व्यवस्था को तोड़कर श्रीनगर गए जहाँ
जेल में उनकी हत्या कर दी गई। पं॰ नेहरू को अपनी गलती का अहसास हुआ, पर बहुत
देर से। शेख अब्दुल्ला को कारागार में डाल दिया गया लेकिन पं॰ नेहरू ने अपनी
मृत्यु से पूर्व अप्रैल, 1964 में उन्हें पुन: रिहा कर दिया।
यूसमर्ग -
प्रकृति का सुन्दर क्षण
श्रीनगर के आसपास के क्षेत्रों
में यूसमर्ग एक अनोखी और मनमोहक मंजिल है। यह लगभग 47 किलोमीटर की दूरी पर स्थित
है और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आदर्श विकल्प है।
यूसमर्ग में आप खूबसूरत घास के
मैदानों का आनंद ले सकते हैं, जो कि एक प्रकृति प्रेमी के लिए किसी भी
जन्नत से कम नहीं है। यह शहर की भीड़-भाड़ से दूर एक सुकून भरा माहौल प्रदान करता
है, जहां आप
कुछ पल शांत और सुरक्षित महसूस कर सकते हैं।
यूसमर्ग की सुंदरता बेमिसाल है।
यहां के खूबसूरत नजारों को देखकर आप सच में प्रकृति की शक्ति और सौंदर्य का अनुभव
कर सकते हैं। यहां घास के मैदान, झरने, झीलें और पहाड़ियां मिलती हैं, जो कि एक
प्राकृतिक स्वर्ग का माहौल पैदा करती हैं।
प्रकृति के इस अद्भुत स्थान पर
आप घूमने, हाइकिंग
करने या बस बैठकर आराम करने का मौका पा सकते हैं। यहां के शांत और सुरक्षित माहौल
में आप अपने मन को शांत कर सकते हैं और तनाव मुक्त हो सकते हैं। यह स्थान आपको
अपने दिमाग को ताजा करने और अपने आप से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।
यूसमर्ग में आप घास पर बैठकर
अपना पिक्निक कर सकते हैं या फिर झरनों के पास घूम सकते हैं। इस स्थान पर आप अपने
परिवार या दोस्तों के साथ भी समय बिता सकते हैं और अद्भुत यादें बना सकते हैं।
यदि आप श्रीनगर की भीड़-भाड़ से
थक गए हैं और कुछ शांत और सुकून के क्षण चाहते हैं, तो यूसमर्ग आपके लिए एक आदर्श
विकल्प है। यह सुंदर प्राकृतिक स्थल आपको एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करेगा और आप
वापस लौटकर अपने दैनिक जीवन में ताजगी महसूस करेंगे।
गुलमर्ग:
जम्मू-कश्मीर का शीतकालीन चमत्कार
जम्मू-कश्मीर राज्य के बारामूला
जिले में स्थित गुलमर्ग एक ऐसा स्थान है जो पूरे साल बर्फ से ढका रहता है। यहां के
बर्फ से ढके पहाड़ इस जगह को एक अद्भुत सौंदर्य प्रदान करते हैं। गुलमर्ग को पूरे
एशिया में स्कीइंग के लिए सबसे बेहतरीन स्थान माना जाता है और यहां एशिया का सबसे
बड़ा और सबसे ऊंचा केबल कार प्रोजेक्ट भी स्थित है।
गुलमर्ग का
भौगोलिक महत्व:
गुलमर्ग जम्मू-कश्मीर के
बारामूला जिले में स्थित है। यह जगह लगभग पूरे साल बर्फ से ढकी रहती है, जिससे इसके
पहाड़ों पर एक अद्भुत सफेद चादर बिछी रहती है। इस बर्फीले परिदृश्य ने गुलमर्ग को
एक आकर्षक पर्यटन स्थल बना दिया है। यह जगह न केवल भारत में, बल्कि पूरे
एशिया में स्कीइंग के लिए सबसे बेहतरीन स्थान माना जाता है।
गुलमर्ग में एशिया का सबसे बड़ा
गंडोला यानी केबल कार प्रोजेक्ट भी स्थित है। यह केबल कार प्रोजेक्ट यहां के
पर्यटकों को पहाड़ों की चोटियों तक पहुंचाने में मदद करता है। इस केबल कार
प्रोजेक्ट की लंबाई लगभग 6 किलोमीटर है और यह 1,600 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचता है।
यह एशिया का सबसे ऊंचा और सबसे लंबा केबल कार प्रोजेक्ट है।
गुलमर्ग का
पर्यटन महत्व:
गुलमर्ग एक पूर्ण पर्यटन स्थल है
जो पूरे साल पर्यटकों को आकर्षित करता रहता है। इसकी बर्फीली वादियां और चमकदार
झीलें पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। स्कीइंग के अलावा, गुलमर्ग
में कई अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं जैसे कि हिमस्खलन, हाइकिंग, स्नोमोबाइलिंग
और कई अन्य शीतकालीन खेल।
गुलमर्ग में सबसे आकर्षक सुविधा
एशिया का सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा केबल कार प्रोजेक्ट है। यह केबल कार पर्यटकों को
पहाड़ों की चोटियों तक पहुंचाता है और उन्हें इस शीतकालीन चमत्कार का आनंद लेने
में सक्षम बनाता है। इस केबल कार का सफर भी खुद एक अद्भुत अनुभव है जिसे पर्यटक
कभी नहीं भूल पाते।
निष्कर्ष:
गुलमर्ग जम्मू-कश्मीर का एक
अद्भुत शीतकालीन चमत्कार है। इस जगह की बर्फीली वादियां और चमकदार झीलें पर्यटकों
को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। यह जगह न केवल भारत में, बल्कि पूरे
एशिया में स्कीइंग के लिए सबसे बेहतरीन स्थान माना जाता है। साथ ही, यहां एशिया
का सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा केबल कार प्रोजेक्ट भी स्थित है जो पर्यटकों को पहाड़ों
की चोटियों तक पहुंचाता है। गुलमर्ग का यह शीतकालीन चमत्कार पर्यटकों को अपनी ओर
आकर्षित करता रहता है।
























