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Friday, June 21, 2024

प्राचीन हिन्दू कला और हस्तशिल्प

 

शिल्पशास्त्र

प्राचीन हिन्दू ज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग शिल्पशास्त्र है। शिल्पशास्त्र वे ग्रन्थ हैं जिनमें विविध प्रकार की कलाओं तथा हस्तशिल्पों की डिजाइन और सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है। ये ग्रन्थ केवल कला और हस्तशिल्प ही नहींबल्कि उनके पीछे के दार्शनिक और आध्यात्मिक आधार को भी प्रस्तुत करते हैं।शिल्पशास्त्र में चौसठ प्रकार की कलाओं का उल्लेख मिलता हैजिन्हें 'बाह्य कलाकहा जाता है। इनमें काष्ठकारीस्थापत्य कलाआभूषण कलानाट्यकलासंगीतवैद्यकनृत्यकाव्यशास्त्र आदि शामिल हैं। इन कलाओं में से प्रत्येक को गहराई से समझा और सीखा जाता थाताकि उन्हें पूर्णता के साथ प्रदर्शित किया जा सके।

इन 'बाह्य कलाओंके अलावाशिल्पशास्त्र में 'आभ्यन्तर कलाओंका भी उल्लेख हैजो मुख्यतः 'कामया प्रेम से सम्बन्धित हैं। इनमें चुम्बनआलिंगनआदि शामिल हैं। यद्यपि ये सभी विषय आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैंलेकिन शिल्पशास्त्र में मुख्य रूप से मूर्तिकला और वास्तुशास्त्र पर ध्यान दिया गया है। मूर्तिकला में मूर्तियों के आकारआयामस्थापनाप्रतिष्ठापनपूजन और प्रतिष्ठापन की विधियों का वर्णन है। वास्तुशास्त्र में भवनोंदुर्गोंमंदिरोंआवासों आदि के निर्माण के सिद्धान्तों और प्रक्रियाओं का वर्णन है।

शिल्पशास्त्र में इन कलाओं के साथ-साथ उनके पीछे के दार्शनिक और आध्यात्मिक आधार को भी समझाया गया है। ये ग्रन्थ केवल कला और हस्तशिल्प की तकनीकी जानकारी ही नहीं देतेबल्कि उनके पीछे के दर्शन और विश्वदृष्टि को भी प्रस्तुत करते हैं। इससे कलाकारों को न केवल तकनीकी ज्ञानबल्कि कला के गहरे आध्यात्मिक आयाम को भी समझने में मदद मिलती है। शिल्पशास्त्र का अध्ययन न केवल कला और हस्तशिल्प के क्षेत्र मेंबल्कि दर्शनज्योतिषवास्तुशास्त्रनृत्यसंगीत और अन्य परंपरागत ज्ञानों के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण है। ये ग्रन्थ प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान का एक महत्वपूर्ण पहलू हैंजिनका अध्ययन कर हम अपने सांस्कृतिक विरासत को और गहराई से समझ सकते हैं।

वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथों का महत्व

वास्तुशास्त्र एक प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसमें स्थापत्यगृह निर्माणनगर योजना और अन्य संबंधित क्षेत्रों पर व्यापक जानकारी दी गई है। इस प्राचीन विद्या में लगभग 350 से अधिक ग्रंथों का वर्णन मिलता हैजिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथों का उल्लेख नीचे किया गया है।

प्रमुख वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ और प्रमुख ग्रंथ

1. मानसार: यह एक प्रमुख वास्तुशास्त्रीय ग्रंथ है जिसमें स्थापत्यगृह निर्माणनगर योजना और अन्य संबंधित विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई है। यह ग्रंथ लगभग 11वीं शताब्दी में लिखा गया था और वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

2. शिल्पशास्त्र: यह एक प्राचीन वास्तुशास्त्रीय ग्रंथ है जिसमें मंदिरोंमहलों और अन्य भवनों के निर्माण से संबंधित जानकारी दी गई है। यह ग्रंथ लगभग 8वीं शताब्दी में लिखा गया था और वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

3. अपराजितप्रच्छा: यह एक प्राचीन वास्तुशास्त्रीय ग्रंथ है जिसमें भवनोंमंदिरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई है। यह ग्रंथ लगभग 8वीं शताब्दी में लिखा गया था और वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

4. मयमत: यह एक प्राचीन वास्तुशास्त्रीय ग्रंथ है जिसमें भवनोंमंदिरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई है। यह ग्रंथ लगभग 7वीं शताब्दी में लिखा गया था और वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

5. विष्णुधर्मोत्तर पुराण: यह एक प्राचीन वास्तुशास्त्रीय ग्रंथ है जिसमें भवनोंमंदिरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई है। यह ग्रंथ लगभग 6वीं शताब्दी में लिखा गया था और वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

इन प्रमुख ग्रंथों के अलावावास्तुशास्त्र के क्षेत्र में कई अन्य ग्रंथों का भी उल्लेख किया जाता हैजैसे कि वास्तुविद्यामार्कण्डेय पुराणब्रह्माण्ड पुराणअग्नि पुराण और कांशिकाविवरण आदि। ये सभी ग्रंथ वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और इस प्राचीन विज्ञान को समझने में मदद करते हैं।

वास्तुशास्त्र एक विशाल और गहन विषय है जिसमें भवनोंमंदिरोंनगरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण से संबंधित सिद्धांत और तकनीकों का वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में दी गई जानकारी वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में अनुसंधान और अध्ययन करने वालों के लिए बहुत उपयोगी है। ये ग्रंथ न केवल प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करते हैंबल्कि इनमें दी गई जानकारी आज भी प्रासंगिक और उपयोगी है।

विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र का व्यापक और महत्वपूर्ण ग्रंथ

वास्तुशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसका इतिहास गहरा और परंपरागत है। इस विषय पर अनेक ग्रंथों और शास्त्रों का विकास हुआ हैजिनमें से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है - विश्वकर्मा प्रकाश। यह ग्रंथ वास्तुशास्त्र के विविध पहलुओं को व्यापक रूप से कवर करता है और वास्तुकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ माना जाता है। विश्वकर्मा प्रकाश में कुल 13 अध्याय हैं

जिनमें से प्रत्येक अध्याय वास्तुशास्त्र के किसी विशिष्ट पहलू को कवर करता है। ये अध्याय हैं:

1. भूमिलक्षण: इस अध्याय में भूमि के प्रकारगुण और चयन के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है।

2. गृह्यादिलक्षण: यह अध्याय गृह और अन्य वास्तुकला संबंधी लक्षणों को समझाता है।

3. मुहुर्त: इस अध्याय में शुभ मुहूर्तों और घड़ियों के चयन के बारे में जानकारी दी गई है।

4. गृहविचार: यह अध्याय घर के निर्माण और आकार-आकृति के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

5. पदविन्यास: इस अध्याय में वास्तुकला में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न पदों और उनके स्थान के बारे में बताया गया है।

6. प्रासादलक्षण: यह अध्याय महलमंदिर और अन्य प्रासादों के लक्षणों और निर्माण प्रक्रिया को समझाता है।

7. द्वारलक्षण: इस अध्याय में द्वारों के प्रकारआकार और स्थान के बारे में जानकारी दी गई है।

8. जलाशयविचार: यह अध्याय कुंडोंतालाबों और अन्य जलाशयों के चयन और निर्माण के बारे में बताता है।

9. वृक्ष: इस अध्याय में वृक्षों के प्रकारगुण और उनके उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की गई है।

10. गृहप्रवेश: यह अध्याय नए घर में प्रवेश करने के लिए शुभ मुहूर्तों और रीति-रिवाजों के बारे में बताता है।

11. दुर्ग: इस अध्याय में किलों और किले के निर्माण के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है।

12. शाल्योद्धार: यह अध्याय पुराने या क्षतिग्रस्त वास्तु-संरचनाओं के पुनर्निर्माण और उद्धार के बारे में जानकारी देता है।

13. गृहवेध: इस अध्याय में घर के विभिन्न हिस्सों में की जाने वाली वेध क्रियाओं के बारे में बताया गया है।

विश्वकर्मा प्रकाश का यह व्यापक विषय-वस्तु वास्तुशास्त्र के विभिन्न पहलुओं को कवर करता है और वास्तुकारोंशिल्पकारों और स्थापत्य विशेषज्ञों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। इस ग्रंथ में दिए गए सिद्धांत और दिशा-निर्देश भारतीय वास्तुकला परंपरा को समझने और उसका अनुसरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। माण्डविक वास्तुशास्त्र का महत्वपूर्ण ग्रन्थ "मयमतम्" कुल 36 अध्यायों पर विस्तृत है। इस ग्रन्थ में वास्तुशास्त्र के विविध पहलुओं को व्यापक रूप से समझाया गया है।

नीचे दिए गए है इन 36 अध्यायों के नाम और संक्षिप्त विवरण:

1. संग्रहाध्याय: वास्तुशास्त्र के मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन।

2. वास्तुप्रकार: वास्तु के प्रकारों का वर्णन।

3. भूपरीक्षा: भूमि की जाँच और परीक्षण विधि का वर्णन।

4. भूपरिग्रह: भूमि का अधिग्रहण और उपयोग विधि का वर्णन।

5. मनोपकरण: वास्तु निर्माण में मन की भूमिका का वर्णन।

6. दिक्-परिच्छेद: दिशाओं के महत्व और उनका वर्णन।

7. पाद-देवता-विन्यास: वास्तु में देवताओं के स्थानों का वर्णन।

8. बालिकर्मविधान: वास्तु निर्माण में बालिकाओं की भूमिका का वर्णन।

9. ग्रामविन्यास: ग्रामीण वास्तु विन्यास का वर्णन।

10. नगरविधान: नगरीय वास्तु विन्यास का वर्णन।

11. भू-लम्ब-विधान: भूमि के आयाम और उनका वर्णन।

12. गर्भन्यासविधान: वास्तु के गर्भगृह का वर्णन।

13. उपपित-विधान: वास्तु के उपपीठ का वर्णन।

14. अधिष्ठान विधान: वास्तु के आधारस्तम्भ का वर्णन।

15. पाद-प्रमान-द्रव्य-संग्रह: वास्तु के पाद (स्तम्भ) और सामग्री का वर्णन।

16. प्रस्तर प्रकरण: वास्तु में प्रस्तर (पत्थर) का उपयोग और विधि का वर्णन।

17. संधिकर्मविधान: वास्तु के संधि (जोड़) कार्य का वर्णन।

18. शिखर-करण-विधान: वास्तु के शिखर का निर्माण विधि का वर्णन।

19. समाप्ति-विधान: वास्तु निर्माण की समाप्ति विधि का वर्णन।

20. एक-भूमि-विधान: एक मंजिला वास्तु का वर्णन।

21. द्वि-भूमि-विधान: दो मंजिला वास्तु का वर्णन।

22. त्रि-भूमि-विधान: तीन मंजिला वास्तु का वर्णन।

23. बहु-भूमि-विधान: बहु मंजिला वास्तु का वर्णन।

24. प्रकर-परिवार: वास्तु के प्रकरों (अंगों) का वर्णन।

25. गोपुर-विधान: वास्तु के गोपुर (द्वार) का वर्णन।

26. मण्डप-विधान: वास्तु के मण्डप (मंडप) का वर्णन।

27. शाला-विधान: वास्तु की शाला (हॉल) का वर्णन।

28. गृहप्रवेश: वास्तु में गृह प्रवेश का वर्णन।

29. राज-वेस्म-विधान: राजवास (महल) का वर्णन।

30. द्वार-विधान: वास्तु के द्वार का वर्णन।

31. यानाधिकार: वास्तु में वाहन का उपयोग और स्थान का वर्णन।

32. यान-शयनाधिकार: वास्तु में वाहन और शयन स्थल का वर्णन।

33. लिंगलक्षण: वास्तु में शिव लिंग का वर्णन।

34. पीठलक्षण: वास्तु में देवी पीठ का वर्णन।

35. अनुकर्म-विधान: वास्तु निर्माण कार्य का क्रमानुसार वर्णन।

36. प्रतिमालक्षण: वास्तु में मूर्तियों का वर्णन।

इस प्रकार "मयमतम्" वास्तुशास्त्र के विविध पहलुओं को व्यापक रूप से समझाता है और वास्तु निर्माण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह ग्रन्थ प्राचीन भारतीय वास्तुकला का महत्वपूर्ण एवं व्यापक दस्तावेज है।

नारद शिल्पशास्त्र के अध्यायों के नाम- ग्रन्थारम्भः

1. कल्पादौ वर्षधारा

2. जनकृतदेवस्तुतिः

3. नारदागमनम्

4. वास्तुपुरुषस्वरूपम्

5. भवनयोग्यभूमिस्वरूपम्

6. ग्रामसीमालक्षणम्

7. ग्रामस्थलसमीकरणम्

8. मार्गलक्षणम्

9. जलाशयतटाकलक्षणम्

10. प्रणालीसेतुनिर्माणम्

11. आयादिप्रमाणलक्षणम्

12. दशविधग्रामलक्षणम्

13. ग्रामः

14. महाग्रामः

15. ब्रह्मपथग्रामः

16. शाङ्करग्रामः

17. वासवग्रामः

18. संकीर्णग्रामः

19. मुखभद्रग्रामः

20. मङ्गलग्रामः

21. शुभग्रामः

22. नगरनिर्माणम्

23. प्रस्तरनगरम्

24. निगमनगरम्

25. पट्टणम्

26. सर्वतोभद्रनगरम्

27. कार्मुकनगरम्

28. स्वस्तिकनगरम्

29. चतुर्मुखनगरम्

30. अष्टमुखनगरम्

31. वैजयन्तपुरम्

32. भूपालनगरम्

33. देवेशनगरम

34. पुरन्दरनगरम्

35. श्रीनगरम्

36. पंचविधदुर्गाणि

37. गिरिदुर्गम्

38. जलदुर्गम्

39. वाहिनीदुर्गम्

40. युद्धदुर्गम्

41. संकीर्णनगरम्

42. ग्रामनगरवीथीप्रमाणम्

43. ग्रामगृहम

44. नगरसदनप्रमाणम्

45. क्षत्रियप्रासादः

46. राजभवनद्वारम्

47. महिषीभवनद्वारशाला

48. विवाहशाला

49. भूमिलंबः

50. भित्तिः

51. अधिष्ठानम्

52. उपपीठम्

53. स्तंभलक्षणम्

54. भौमभित्तिः

55. सन्धिकर्म ,

56. तिर्यकदारुकम्

57. चन्द्रशाला

58. शिखरकलशम्

59. भौमान्तर्गेहम्

60. शयनशाला

61. भोजनशाला

62. नानागेहानि

63. चत्वरम्

64. नीतिशाला

65. नाटकशाला

66. चित्रशाला

67. वातायनलक्षणम्

68. डोलालक्षणम

69. पर्यकशिबिकालक्षणम्

70. सिंहासनम्

71. चित्रालंकृतिः

72. देवालयबलिकर्म

73. दैवगर्भविन्यासः

74. गर्भगृहम्

75. गोपुरकल्पनम्

76. प्राकारकल्पनम्

77. मण्टपलक्षणम्

78. बलिपीठम्

79. ध्वजस्तंभः

80. देवबिम्बनिर्माणम्

81. बिम्बपीठम

82. गृहप्रवेश:

83. नानायाननिर्माणम्

नारद शिल्पशास्त्र का एक महत्वपूर्ण प्राचीन भारतीय ग्रंथ है जो वास्तुशास्त्र से संबंधित है। इस ग्रंथ में वास्तु और शिल्प कला के विविध पहलुओं पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है।  नारद शिल्पशास्त्र का यह अध्याय-सूची भारतीय वास्तुकला के अनमोल धरोहर को प्रदर्शित करती है। इसमें शिल्प और वास्तु कला के व्यापक क्षेत्रों को समेटने वाले 83 अध्यायों का उल्लेख किया गया है। इन अध्यायों में ग्रामनगरमहलमंदिरप्रासाददुर्ग और अन्य संरचनाओं के निर्माण से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई है।

प्रथम अध्याय 'कल्पादौ वर्षधारासे शुरू होकर अंतिम अध्याय 'नानायाननिर्माणम्तक इस ग्रंथ में वास्तुकला के सर्वोत्तम प्रमाण एवं मार्गदर्शन उपलब्ध है। इन अध्यायों में वर्णित विषयों में भूमि चयननिर्माणसंरचनाआकृतिगठनसजावट और अनुष्ठान जैसे पहलू शामिल हैं।

नारद शिल्पशास्त्र हमारी वास्तुकला परंपरा का अमूल्य आधार है। इसमें वर्णित विविध प्रकार के ग्रामनगरमहलमंदिर आदि के निर्माण से संबंधित नियम और प्रक्रियाएं भारतीय वास्तुकला के अभिन्न अंग हैं। यह ग्रंथ शिल्पीवास्तुकारइतिहासकार और शोधार्थी के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ है।

 

 

 

 


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