लघु उद्योगों का महत्व और भारत में इनका योगदान
लघु उद्योग भारत की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये छोटे
उद्योग मध्यम स्तर के विनियोग की सहायता से उत्पादन प्रारम्भ करते हैं और श्रम
शक्ति की मात्रा भी कम होती है। इन इकाइयों में सापेक्षिक रूप से वस्तुओं एवं
सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। लघु उद्योग { छोटे पैमाने की औद्योगिक इकाइयाँ } बड़े
पैमाने के उद्योगों से पूंजी की मात्रा, रोजगार, उत्पादन
एवं प्रबन्ध, आगतों एवं निर्गतों के प्रवाह आदि की
दृष्टि से भिन्न प्रकार के होते हैं। ये कुटीर उद्योगों से भी उत्पादन में
यंत्रीकरण की मात्रा, मजदूरी पर लगाये गये श्रमिकों एवं
परिवारिक श्रमिकों के अनुपात, बाजार का भौगोलिक आकार, विनियोजित
पूंजी आदि आधारों पर भिन्न होते हैं।
लघु उद्योगों का महत्व इस बात से भी स्पष्ट होता है कि वर्ष 2021-22 में देश
में 6.3 करोड़ लघु उद्योग इकाइयाँ थीं, जो देश में कुल औद्योगिक इकाइयों का
99.4 प्रतिशत हिस्सा थीं। इन इकाइयों में करीब 11 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त कर रहे थे।
लघु उद्योगों का निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2021-22 में लघु
उद्योगों का कुल निर्यात लगभग 32 प्रतिशत था। इन उद्योगों के माध्यम से देश में
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 6 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया
जाता है।
लघु उद्योग अर्थव्यवस्था के लिए केवल आर्थिक महत्व ही नहीं रखते, बल्कि
सामाजिक महत्व भी रखते हैं। ये उद्योग विशेषकर ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों
में स्थित होते हैं और अपने आस-पास के लोगों को रोजगार प्रदान करके उनकी आर्थिक
स्थिति को मजबूत करते हैं। इसके अलावा, ये उद्योग स्थानीय कच्चे माल का उपयोग
करके उत्पादन करते हैं और इस प्रकार पर्यावरण को भी संरक्षित करते हैं।
समयानुसार लघु उद्योगों की नई प्रौद्योगिकियों से लैस होने और उनके उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार लाने की आवश्यकता है। इससे न केवल उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि देश के समग्र औद्योगिक विकास में भी उल्लेखनीय योगदान करेंगे। सरकार और नीति निर्माताओं को इस दिशा में और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।
सूक्ष्म, लघु और
मध्यम उद्योग
भारत में लघु उद्योग क्षेत्र एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न केवल देश
के आर्थिक विकास में योगदान देता है, बल्कि रोजगार सृजन और क्षमता निर्माण
में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लघु उद्योग क्षेत्र को तीन प्रमुख श्रेणियों
में वर्गीकृत किया गया है - सूक्ष्म उद्योग, लघु उद्योग और मध्यम उद्योग।
सूक्ष्म
उद्योग:
सूक्ष्म उद्योगों में निवेश की सीमा ₹1 करोड़ तक होती
है और वार्षिक कारोबार ₹5 करोड़ तक होता
है। ये उद्योग छोटे पैमाने पर संचालित होते हैं और आमतौर पर परिवार द्वारा चलाए
जाते हैं। सूक्ष्म उद्योगों में मुख्य रूप से हस्तशिल्प, कृषि-आधारित उत्पाद, खाद्य
प्रसंस्करण और अन्य परंपरागत कौशल-आधारित गतिविधियां शामिल हैं। ये उद्योग अक्सर
स्थानीय स्तर पर संचालित होते हैं और स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर
प्रदान करते हैं।
लघु
उद्योग:
लघु उद्योगों में निवेश की सीमा ₹10 करोड़ तक होती है और वार्षिक कारोबार
₹50 करोड़ तक
होता है। ये उद्योग छोटे या मध्यम पैमाने पर संचालित होते हैं और अक्सर कुशल
श्रमिकों द्वारा संचालित किए जाते हैं। लघु उद्योगों में मुख्य रूप से इंजीनियरिंग
वस्तुएं, कपड़े, सॉफ्टवेयर
विकास, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य विनिर्माण
गतिविधियां शामिल हैं। ये उद्योग क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उत्पादों को
बेचते हैं।
मध्यम
उद्योग:
मध्यम उद्योगों में निवेश की सीमा ₹50 करोड़ तक
होती है और वार्षिक कारोबार ₹250 करोड़ तक
होता है। ये उद्योग बड़े पैमाने पर संचालित होते हैं और व्यावसायिक रूप से संचालित किए
जाते हैं। मध्यम उद्योगों में मुख्य रूप से यांत्रिक उपकरण, ऑटोमोबाइल
घटक, बड़े पैमाने पर खाद्य प्रसंस्करण और
अन्य उत्पादन गतिविधियां शामिल हैं। ये उद्योग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर
पर अपने उत्पादों को बेचते हैं।
सरकार ने इन लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न नीतियां और
योजनाएं लागू की हैं, जैसे कि क्रेडिट गारंटी योजना, टेक्नोलॉजी
अपग्रेडेशन कोष, क्लस्टर विकास कार्यक्रम आदि। इन उपायों
से इन उद्योगों को मजबूत बनाने और उनके विकास को प्रोत्साहित करने में मदद मिलती
है।
समग्र रूप से, लघु उद्योग क्षेत्र भारत की आर्थिक
प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत
लघु उद्योग विभिन्न पैमानों पर संचालित होते हैं और देश के विकास में अपना योगदान
देते हैं। सरकार और निजी क्षेत्र के समर्थन से, ये उद्योग और मजबूत होंगे और भविष्य में
और अधिक प्रगति करेंगे
भारतीय
अर्थव्यवस्था के खंभे
एमएसएमई क्षेत्र का वर्गीकरण मुख्य रूप से निवेश मापदंडों पर आधारित है।
सूक्ष्म उद्योग वह है जहां प्लांट और मशीनरी में निवेश 25 लाख रुपये से अधिक नहीं
होता है। लघु उद्योग वह है जहां प्लांट और मशीनरी में निवेश 25 लाख रुपये से अधिक
लेकिन 5 करोड़ रुपये से कम होता है। मध्यम उद्योग वह है जिसमें प्लांट और मशीनरी
में निवेश 5 करोड़ रुपये से अधिक लेकिन 10 करोड़ रुपये से कम होता है।
एमएसएमई
क्षेत्र का महत्व निम्नलिखित कारणों से स्पष्ट है
1. रोजगार सृजन: एमएसएमई क्षेत्र
देश में रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह क्षेत्र
देश की कुल औद्योगिक रोजगार क्षमता का लगभग 80% प्रदान करता है।
2. आर्थिक विकास में योगदान:
एमएसएमई क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 30% का योगदान देता
है। यह क्षेत्र देश के औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका
निभाता है।
3. प्रौद्योगिकी नवाचार: एमएसएमई
क्षेत्र तकनीकी नवाचार और अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में अग्रणी है। ये उद्यम
अक्सर बाजार की मांगों के अनुरूप नए उत्पाद और प्रक्रियाओं का विकास करते हैं।
4. समावेशी विकास: एमएसएमई
क्षेत्र देश के विकास में समावेशी प्रकृति का योगदान देता है। ये उद्यम ग्रामीण और
अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थापित होकर स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करते
हैं।
5. निर्यात प्रोत्साहन: एमएसएमई
क्षेत्र देश के कुल निर्यात में लगभग 40% का योगदान देता है। ये उद्यम अक्सर
विशिष्ट उत्पादों का निर्यात करके भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
समग्र रूप से, एमएसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का
एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस क्षेत्र का सशक्तीकरण और विकास देश के लिए एक
प्राथमिकता बन गया है। एमएसएमई क्षेत्र में निवेश और नवाचार को बढ़ावा देकर हम
भारत को एक आत्मनिर्भर, समावेशी और समृद्ध अर्थव्यवस्था में
परिवर्तित कर सकते हैं।
छोटे और
मध्यम उद्यमों का महत्व
सेवा उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ता हुआ
क्षेत्र है। इस क्षेत्र में छोटे और मध्यम उद्यमों (एसएमई) की भूमिका अत्यंत
महत्वपूर्ण है।
सेवा
उद्योग में एसएमई को निम्नलिखित आधार पर परिभाषित किया जा सकता है
1. सूक्ष्म उद्योग: जहाँ उपकरणों में
निवेश 10 लाख रुपये से अधिक नहीं है।
2. लघु उद्योग: जहाँ उपकरणों में
निवेश 10 लाख रुपये से अधिक है, लेकिन 2 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है।
3. मध्यम उद्योग: जहाँ उपकरणों में
निवेश 2 करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन 5 करोड़ रुपये से कम है।
सरकार ने एसएमई के लिए कई योजनाएं और पहल शुरू की हैं, जैसे
कि 'मेक इन इंडिया', 'स्टैंड अप इंडिया', और 'स्किल इंडिया'।
ये पहल एसएमई को वित्तीय, प्रौद्योगिकीय, और
कौशल विकास सहायता प्रदान करती हैं। इससे एसएमई को अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने
और विकास करने में मदद मिलती है।
सेवा उद्योग में छोटे और मध्यम उद्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए, सरकार
और उद्योग को इन उद्यमों को और अधिक समर्थन और सुविधाएं प्रदान करने की आवश्यकता
है। इससे न केवल एसएमई का विकास होगा, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भी
इनका योगदान बढ़ेगा।
सेवा उद्योग में एसएमई की भूमिका पर चर्चा करते हुए, हम
देख सकते हैं कि ये उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किस प्रकार महत्वपूर्ण हैं। इन
उद्यमों को प्रोत्साहित करके और उनका समर्थन करके, हम
सेवा उद्योग के विकास को और तेज कर सकते हैं।
भारतीय
आर्थिक विकास में लघु एवं कुटीर पैमाने के उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका
भारत के विकास में लघु एवं कुटीर पैमाने के उद्योगों का योगदान अतुलनीय रहा
है। ये उद्योग न केवल राष्ट्रीय जीवन की धड़कन हैं, बल्कि
आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत
महत्वपूर्ण हैं।
लघु एवं कुटीर उद्योगों की महत्ता को देखते हुए, भारत
सरकार ने इन क्षेत्रों को विकास के लिए विशेष प्राथमिकता दी है। वर्तमान में, लघु
और कुटीर उद्योग भारत के विनिर्माण क्षेत्र की संरचना और स्वरूप के महत्वपूर्ण
हिस्से हैं। ये उद्योग देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 30 प्रतिशत का
योगदान देते हैं और देश के कुल निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा भी प्रदान करते
हैं।
लघु एवं कुटीर उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम हैं। ये न केवल
देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, बल्कि
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर भी प्रदान करते हैं। सरकार
द्वारा इन क्षेत्रों को दी जा रही विशेष प्राथमिकता से इनकी भूमिका और महत्व और
बढ़ जाएगा।
लघु
उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) भारतीय
अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग हैं। यह क्षेत्र न केवल देश की औद्योगिक गतिविधियों
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि उद्यमिता को प्रोत्साहित करने और
रोजगार सृजन में भी अहम योगदान देता है।
दूसरे, एमएसएमई
क्षेत्र रोजगार सृजन में भी अहम भूमिका निभाता है। वर्तमान में, इस क्षेत्र
में लगभग 1.28 करोड़ माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम हैं, जो लगभग
3.12 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। यह आंकड़ा बड़े उद्योगों की तुलना
में लगभग 4 गुना अधिक है। इस प्रकार, एमएसएमई क्षेत्र ग्रामीण और
अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता
है।
चौथे, एमएसएमई
क्षेत्र देश की आत्मनिर्भरता और आयात प्रतिस्थापन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता
है। ये उद्यम अक्सर घरेलू बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होते हैं और आयात को कम
करने में मदद करते हैं। इसके साथ ही, कई एमएसएमई इकाइयां निर्यात भी
करती हैं, जिससे देश की
विदेशी मुद्रा कमाई में योगदान मिलता है।
लघु
उद्योगों के उद्देश्य और महत्व
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये उद्योग न
केवल आर्थिक विकास में योगदान देते हैं, बल्कि समाज और संस्कृति के विकास में भी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लघु उद्योगों के मुख्य उद्देश्यों और महत्व को
निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. रोजगार सृजन: लघु उद्योगों का
प्राथमिक उद्देश्य बेरोजगारी और अर्ध-बेरोजगारी की समस्या का समाधान करना है। ये
उद्योग श्रम-प्रधान होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक रोजगार सृजित करते हैं।
2. आर्थिक शक्ति का समान वितरण: लघु
उद्योगों का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य आर्थिक शक्ति का समान वितरण करना है। ये
उद्योग स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास को समान
रूप से प्रोत्साहित करते हैं।
3. औद्योगिक विकेन्द्रीकरण: लघु
उद्योगों के माध्यम से देश में औद्योगिक विकेन्द्रीकरण संभव हो पाता है। इससे
प्रौद्योगिकी संतुलन और क्षेत्रीय विषमता को कम करने में मदद मिलती है।
4. औद्योगिक शांति: लघु उद्योग
श्रम-प्रधान तकनीक पर आधारित होने के कारण श्रमिकों की बहुलता रहती है। इस कारण ये
उद्योग औद्योगिक शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
5. सांस्कृतिक संरक्षण: लघु उद्योगों
के माध्यम से देश की सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण होता है। ये उद्योग कलात्मक और
परंपरागत वस्तुओं का निर्माण करते हैं, जिससे सामाजिक सदभाव, सहकारिता और
समानता की भावना को बल मिलता है।
6. प्राकृतिक साधनों का उपयोग: लघु
उद्योगों का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक साधनों का अनुकूलतम उपयोग करना है। इससे
पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है।
7. मानवीय मूल्यों का संवर्धन: लघु
उद्योगों का उद्देश्य 'सादा जीवन उच्च विचार' की भावना को
प्रोत्साहित करना है। ये मानवीय मूल्यों के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते
हैं।
8. व्यापार और भुगतान संतुलन: लघु
उद्योग आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करके व्यापार और भुगतान संतुलन को अनुकूल बनाते
हैं।
9. उपभोक्ताओं को प्रदान: लघु उद्योग
आम जनता को गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।
10. अधिक उत्पादन: लघु उद्योग भारतीय
अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अधिक से अधिक श्रेष्ठ उत्पादन करने
का प्रयास करते हैं।
इस प्रकार, लघु उद्योग राष्ट्रीय विकास और समृद्धि
में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये उद्योग रोजगार सृजन, आर्थिक
विकेन्द्रीकरण, सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यावरण
संरक्षण और मानवीय मूल्यों के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लघु
उद्योग: छोटे निवेश में बड़ी संभावनाएं
लघु उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण और गतिशील हिस्सा है। ये उद्योग न केवल रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं, बल्कि देश के सतत् विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लघु उद्योग वर्ग में आने वाले कई उद्यमों ने न केवल अपने उत्पादों के माध्यम से भारतीय बाजार में अपनी पहचान बनाई है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
लघु
उद्योगों की परिभाषा और विशेषताएं
भारतीय उद्योग मंत्रालय के अनुसार, किसी भी उद्योग को लघु उद्योग माना जाता
है, जिसमें 10 लाख रुपये से अधिक और एक
करोड़ रुपये से कम की लागत आती है। इस परिभाषा के अनुसार, कूलर
बनाना, एल्यूमीनियम सामग्री निर्माण, स्ट्रेचर
बनाना, मीटर बनाना, गाड़ी
की हेडलाइट बनाना, बैग बनाना, कांटेदार
तार बनाना और टोकरी बनाना जैसे उद्योग लघु उद्योग कक्षा में आते हैं।
लघु
उद्योगों की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं:
1. कम पूंजी निवेश: लघु उद्योगों
में पूंजी निवेश की आवश्यकता बहुत कम होती है। इसलिए इन उद्योगों में उद्यमिता को
बढ़ावा देने में आसानी होती है।
2. श्रम-प्रधान प्रौद्योगिकी:
लघु उद्योगों में मशीनों की अपेक्षा मानव श्रम का अधिक उपयोग होता है। इससे रोजगार
सृजन में मदद मिलती है।
3. लचीली प्रक्रियाएं: लघु
उद्योगों में उत्पादन प्रक्रियाएं अधिक लचीली और आसान होती हैं। इससे बाजार की
मांगों के अनुरूप उत्पादन में तेजी से बदलाव किया जा सकता है।
4. स्थानीय संसाधनों का उपयोग:
लघु उद्योग स्थानीय कच्चे माल और संसाधनों का उपयोग करते हैं। इससे परिवहन लागत कम
होती है और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है।
5. क्षेत्रीय विकास में योगदान:
लघु उद्योग ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थापित होते हैं। इससे इन
क्षेत्रों के आर्थिक और सामाजिक विकास में मदद मिलती है।
लघु उद्योगों
की विविधता और महत्व
लघु उद्योगों की श्रेणी में कई प्रकार
के उद्योग शामिल हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं:
1. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग:
इसमें मिठाइयां,
पकवान, कच्चे तेल, दूध उत्पाद
आदि शामिल हैं।
2. हस्तशिल्प और कलाकृति उद्योग:
इसमें कागज कला,
हाथ से बने
परदे, चमड़े की
सजावटी वस्तुएं,
मिट्टी के
बर्तन आदि शामिल हैं।
3. इंजीनियरिंग उद्योग: इसमें
मशीन पुर्जे,
उपकरण, आटो
पार्ट्स आदि शामिल हैं।
4. पर्यावरण संरक्षण उद्योग:
इसमें सौर ऊर्जा, बायोफ्यूल, पुनर्नवीकरण आदि शामिल हैं।
5. सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग:
इसमें सॉफ्टवेयर विकास, वेब डिजाइन, डिजिटल मार्केटिंग आदि शामिल
हैं।
लघु उद्योग न केवल रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि
देश के समग्र आर्थिक विकास में भी अहम योगदान देते हैं। ये उद्योग अर्थव्यवस्था को
मजबूत बनाने में मदद करते हैं और देश के औद्योगिक विकास को गति प्रदान करते हैं।
इसके साथ ही, ये उद्योग स्थानीय संसाधनों का उपयोग
करके क्षेत्रीय विकास में भी योगदान देते हैं।
भारतीय लघु
उद्योग क्षेत्र की चुनौतियां और उपाय
हालांकि
लघु उद्योग क्षेत्र में कई संभावनाएं हैं, लेकिन कुछ
चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। इनमें से प्रमुख हैं:
1. पूंजी और वित्तीय संसाधनों की कमी
2. आधुनिक प्रौद्योगिकी का कम उपयोग
3. प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी
4. विक्रय और विपणन में कमजोरी
5. बाजार तक पहुंच में कठिनाई
समग्र रूप
से देखा जाए, तो लघु उद्योग क्षेत्र भारतीय
अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। इन उद्योगों का विकास न केवल आर्थिक प्रगति में
मदद करता है, बल्कि रोजगार सृजन और स्थानीय
विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सही नीतियों और समर्थन के साथ, लघु उद्योग
क्षेत्र भारत को एक समृद्ध और उन्नत देश बनाने में अहम योगदान दे सकता है।













